पौधे को वटवृक्ष बनाने वाले गुरू ने कहा, वजूद आज भी जड़ों पर खड़ा है
अजय तिवारी संध्या हो रही थी जब आगाज हुआ… पूरा होते-होते संध्या ढल चुकी थी। “परिंदे” जो दशकों पहले “एक पेड़” की किसी डाली पर बैठकर नई उड़ान के लिए हर रात, दूसरे की दिन की सुबह के लिए सो जाते थे। उन्हे हर दिन सुबह पेड़ की पत्तियां की आहट उठाती थीं। नई उड़ान…