अजय तिवारी, संपादक
दशकों से चल रहा ‘शैडो वॉर’ (परछाइयों की जंग) अब खुले मैदान में आ चुका है। इजरायल द्वारा ईरान के रक्षा मंत्री और IRGC कमांडर को निशाना बनाने के दावों ने मध्य पूर्व (Middle East) के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। यह अब केवल दो देशों की दुश्मनी नहीं, बल्कि वैश्विक शक्तियों के शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बन गया है।
कूटनीति की विफलता और सैन्य आक्रामकता
ईरान और इजरायल के बीच सीधे टकराव का मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और ‘बैक-चैनल’ वार्ताएँ विफल हो चुकी हैं। इजरायल की रणनीति अब ‘डिफेंस’ (रक्षा) से बदलकर ‘प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक’ (पहले हमला करना) पर टिकी है, ताकि ईरान की सैन्य कमर तोड़ी जा सके। वहीं, ईरान इसे अपने संप्रभुता और अस्तित्व पर हमला मान रहा है।
अमेरिका की भूमिका और वैश्विक ध्रुवीकरण
इस युद्ध में अमेरिका की सीधी भागीदारी ने इसे और जटिल बना दिया है। अमेरिका की ‘आयरनक्लैड’ प्रतिबद्धता इजरायल के साथ है, जो रूस और चीन जैसे देशों को ईरान के करीब ला सकती है। यदि यह युद्ध खिंचता है, तो दुनिया स्पष्ट रूप से दो गुटों में बंट जाएगी, जो 1945 के बाद की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती होगी।
मासूमों की बलि और मानवीय त्रासदी
युद्ध की सबसे डरावनी तस्वीर सैन्य हताहतों से नहीं, बल्कि आम नागरिकों की मौतों से उभरती है। हालिया हमलों में 87 बच्चियों की मौत ने दुनिया के विवेक को झकझोर दिया है। रिहायशी इलाकों का युद्ध क्षेत्र में बदलना यह दर्शाता है कि आधुनिक युद्ध में ‘मर्यादा’ और ‘जिनेवा कन्वेंशन’ की फाइलें धूल फांक रही हैं।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
- तेल का खेल: होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने का खतरा पूरी दुनिया में तेल संकट पैदा कर सकता है।
- महंगाई की मार: आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) टूटने से खाद्यान्न और तकनीक की कीमतें आसमान छू सकती हैं।
शांति का रास्ता या विनाश?
इतिहास गवाह है कि युद्ध कभी समाधान नहीं लाता। इजरायल की सैन्य श्रेष्ठता और ईरान की क्षेत्रीय पैठ के बीच पिस रही है केवल मानवता। यदि संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक महाशक्तियाँ तुरंत हस्तक्षेप नहीं करतीं, तो यह ‘क्षेत्रीय संघर्ष’ पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लेने वाला ‘महायुद्ध’ बन जाएगा।
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