अजय तिवारी,
BDC News | bhopalonline.org
भोपाल में एक महिला रिटायर्ड जज की बहू और अभिनेत्री ट्विशा शर्मा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने एक बार फिर हमारे सामाजिक और कानूनी ढांचे को झकझोर कर रख दिया है। घटना के 12 दिन बाद, दिल्ली एम्स की टीम द्वारा दोबारा किए गए पोस्टमॉर्टम और भाई मेजर हर्षित द्वारा दी गई मुखाग्नि की तस्वीरें किसी भी संवेदनशील दिल को रुला देने के लिए काफी हैं। लेकिन इस दुख के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या एक उभरती हुई जिंदगी वाकई ग्लैमर और घरेलू जीवन के अंतर्विरोधों की भेंट चढ़ गई, या फिर इसके पीछे कोई गहरी और डरावनी साजिश है?
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने इसका स्वत: संज्ञान लिया है और राज्य के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इसकी जांच सीबीआई (CBI) को सौंपने पर सहमति दे दी है। जब मामला एक रसूखदार परिवार से जुड़ा हो—जहाँ ससुर खुद कानून के रक्षक (रिटायर्ड जज) रहे हों—तब न्याय प्रक्रिया पर जनता की नजरें और भी पैनी हो जाती हैं। मायके पक्ष का हत्या का आरोप और पति का इसे अवसाद जनित आत्महत्या बताना, दो ऐसे छोर हैं जिनके बीच का सच अब केवल वैज्ञानिक साक्ष्यों से ही सामने आ सकता है।
पति समर्थ सिंह का यह बयान कि ‘प्रेग्नेंसी के बाद ट्विशा का व्यवहार बदला और वह घरेलू जीवन को मुश्किल मानती थी’, अमूमन ऐसे मामलों में बचाव का एक घिसा-पिटा तर्क नजर आता है। क्या वाकई एक स्थापित अभिनेत्री सिर्फ इस वजह से ऐसा आत्मघाती कदम उठा सकती है, या फिर यह मानसिक प्रताड़ना का नतीजा था? दिल्ली एम्स के फॉरेंसिक विभाग के प्रमुख डॉ. सुधीर गुप्ता की टीम द्वारा विसरा और हिस्टोपैथोलॉजी जांच के जो सैंपल लिए गए हैं, वे इस रहस्य से पर्दा उठाने में सबसे अहम साबित होंगे।
न्याय का तकाजा यह कहता है कि जांच निष्पक्ष हो और किसी भी रसूख के दबाव से मुक्त हो। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी और सीबीआई की एंट्री ने पीड़ित परिवार को एक उम्मीद दी है। ट्विशा की मां के आंसू और भाई की बेबसी का कर्ज तभी चुकेगा, जब सच बिना किसी मिलावट के सामने आएगा। यह मामला महज एक हाई-प्रोफाइल मौत का नहीं है, बल्कि कानून के उस भरोसे का है जो हर नागरिक को सुरक्षित महसूस कराता है।
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