Headlines

अहंकार के महलों में सेंध, ‘कॉकरोच’ बने व्यवस्था के आईने

अहंकार के महलों में सेंध, ‘कॉकरोच’ बने व्यवस्था के आईने
👁️ 66 Views

अजय तिवारी
एडिटर इन चीफ

जब सत्ता के गलियारों से युवाओं को ‘परजीवी’ और ‘कॉकरोच’ कहकर दुत्कार दिया गया, तब शायद हुक्मरानों को यह इल्म नहीं था कि यही अपमानजनक उपमा एक दिन उनके अहंकार के महलों को ढहाने की सबसे बड़ी ताकत बन जाएगी। देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर हर गली-कूचे तक गूंजी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का आंदोलन महज कुछ युवाओं का आक्रोश नहीं, बल्कि उस सड़ती और असंवेदनशील व्यवस्था के खिलाफ खुला विद्रोह था, जिसने डिग्रियों से लैस युवाओं के भविष्य को दीमक की तरह चाट लिया है।

पेपर लीक के नासूर और चरम पर पहुंची बेरोजगारी से आजिज आ चुके देश के नौजवानों ने जब इस डिजिटल और ज़मीनी व्यंग्य मंच के बैनર तले हुंकार भरी, तो सरकार की चूलें हिल गईं। जो हुआ वह गवाह है कि कैसे पुलिसिया लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोलों और दमन के तमाम हथकंडों के बावजूद यह सैलाब थमने के बजाय और अधिक गहरा  होता गया। आखिरकार, अहंकारी सत्ता को युवाओं की इस जिद के आगे झुकना ही पड़ा और केंद्रीय शिक्षा मंत्री को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। यह इस्तीफा महज एक कुर्सी का छूटना नहीं है, बल्कि उस तानाशाही सोच की हार है जो जनता की आवाज को कुचलने का माद्दा रखती थी।

सरकार का यह कदम इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि जब देश का युवा ठान ले, तो सिंहासन की नींव हिल जाती है। हालांकि, केवल एक मंत्री के इस्तीफे से व्यवस्था के तमाम पाप नहीं धुल जाते। शिक्षा माफियाओं की कमर तोड़ने, रोजगार के नए रास्ते खोलने और युवाओं के दमन पर माफी मांगने तक यह संघर्ष अधूरा है।

तथाकथित मुख्यधारा की सियासत और हुक्मरानों को यह चेत जाना चाहिए कि जनभावनाओं को दबाने की हर कोशिश का हस्र यही होगा। यदि अब भी नीति-निर्माताओं ने युवाओं की अनदेखी जारी रखी, तो यह ‘कॉकरोच’नुमा चिंगारी पूरे तंत्र को भस्म करने में देर नहीं लगाएगी। वक्त आ गया है कि सरकार दमन छोड़ दे और जमीन पर उतरकर जवाबदेही तय करे, क्योंकि लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है, और उसकी आवाज से बड़ी कोई ताकत नहीं होती।

विपक्ष ने युवा के सैलाब में अपनी नॉव दौड़ने की पूरी कोशिश की, जो आगे भी जारी रहेगी। आज यदि कामयाबी से खुश है तो वह युवा, लेकिन नजर रखने होगी सरकार वादों को जमीन पर उतरने तक। 12 साल में पहला मौका है, जब सरकार के किसी मंत्री को दबाव के चलते कुर्सी छोड़नी पड़ी है। कहा जा रहा है- देश में सरकार और सरकार के पक्ष दिख रहे मीडिया को गहरा सबक दे गया कॉकरोज का आंदोलन। आंदोलनकारी न केवल सरकार से टकराए बल्कि उस मीडिया को भी अपने पास नहीं भटकने दिया, जो लोक तंत्र में सत्ता का गान गा रहा है। आंदोलन के दौरान तमाम नेरेटिव सेट किए गए, आंदोलन के पीछे बाहरी ताकतें हैं। युवाओं का भटकाया जा रहा है।
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के अंतिम घंटों में जो घटा वह ताकत और अहंकारी प्रवृत्ति से बस बहुत हुआ कहने वाला है।




Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *