डॉ. प्रितम भि. गेडाम
जीव और प्रकृति एक दूसरे के पूरक है, मनुष्य जीव ने अपनी बुद्धिमत्ता के बलबूते पर विकसित होकर नवनवीन खोज द्वारा सुविधाजनक भौतिक वस्तुओं का निर्माण किया। समयानुसार स्वार्थी मनुष्य की लालसा बढ़ती रहीं, फिर उसने जीवनदायिनी प्रकृति का दोहन शुरू किया। मनुष्य ने अपनी सुविधाओं, विलासिता के लिए प्रकृति को कष्ट पहुंचाया, धीरे-धीरे वहीं सुविधाएं मनुष्य के जीवन में विषैला जहर घोलने लगी। आज इतनी भयावह स्थिति है कि, हमें मारने के लिए कोई शस्त्र की आवश्यकता नहीं है, हमारे द्वारा उत्पन्न प्रदूषण, मिलावटखोरी, यांत्रिकी निर्भरता और प्रकृति की लूट ही हमें दर्दनाक बीमारी से ग्रसित करके समय से पहले ही मार रही हैं। मनुष्य ने प्लास्टिक का अत्यधिक प्रयोग किया, वहीं प्लास्टिक आज जीवसृष्टि के लिए काल बन चूका हैं। मनुष्य के स्वार्थवृत्ति की सजा संपूर्ण जीवों को भुगतनी पड़ रही हैं। यह प्लास्टिक हजार साल तक नष्ट नहीं होता है, इतना ज्यादा प्लास्टिक मतलब मनुष्य के मस्तिष्क में भी यह पहुंच चूका है, गर्भावस्था में भ्रूण के शरीर में, पशु-पक्षी, जानवर, जलचर, थलचर अर्थात प्रत्येक जीव-जंतुको में, हर किसी के शरीर में प्लास्टिक पाया जा रहा हैं। प्लास्टिक टूटकर माइक्रोप्लास्टिक के रूप में हजार साल तक पर्यावरण में घुला रहता हैं।
अनजाने में सभी प्लास्टिक खा-पी रहे है, प्लास्टिक कचरा पचाया नहीं जा सकता। अक्सर हम पशु-पक्षियों, जीवों को प्लास्टिक थैली या प्लास्टिक जाल में उलझकर जान गवांते हुए देखते हैं। प्लास्टिक को जलाने से हवा में बहुत ज़हरीली गैसें निकलती है, जमीन में प्लास्टिक धीरे-धीरे टूटता है और दुनिया भर में मीथेन उत्सर्जन का एक बड़ा कारण बनता है, जिससे स्थानीय बायोडायवर्सिटी को खतरा होता हैं। प्लास्टिक में रासायनिक और ज़हरीले पदार्थ होते है, माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक दुनिया भर में पानी की सप्लाई, खेती की मिट्टी और जीवों को दूषित करते हैं। प्लास्टिक से हार्मोनल गड़बड़ी, प्रजनन संबंधी समस्या, दिल की बीमारियों, कैंसर का गंभीर खतरा बनता हैं। ये थायराइड में गड़बड़ी पैदा करने, डायबिटीज का खतरा बढ़ाने में भी कारगर हैं। प्लास्टिक फाइबर के संपर्क में आने वाले वर्कर्स को फेफड़ों की बीमारियां हो सकती हैं। प्लास्टिक के वायु प्रदूषण के कारण ल्यूकेमिया, लिम्फोमा और सांस की बीमारियों के गंभीर ख़तरे का भी सामना करना पड़ता हैं। प्लास्टिक कचरे का योग्य निपटान और व्यवस्थापन न होने के कारण निकलनेवाली ग्रीनहाउस गैसें ग्लोबल वार्मिंग को बढाती हैं। हर साल 5.8 मिलियन टन से ज़्यादा प्लास्टिक कचरे को जलाया जाता है अर्थात पर्यावरण में विषैली गैसें छोड़ी जाती हैं।
“अंतराष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्त दिवस” हर साल 3 जुलाई को पुरे विश्व में जनजागरूकता के लिए मनाया जाता हैं। एकल उपयोगवाली प्लास्टिक बैग से संपूर्ण पर्यावरण को होनेवाले नुकसान के प्रति जागरूकता जगाना अतिआवश्यक हैं। प्लास्टिक पर निर्भरता कम करके उसके विकल्पों के बारे में बढ़ावा देना इस दिवस का उद्देश्य हैं। भारत में हर साल लगभग 5.5 मिलियन टन सिंगल-यूज़ प्लास्टिक कचरा पैदा होता हैं। भारत में एक व्यक्ति साल में कुल मिलाकर लगभग 11 किलोग्राम प्लास्टिक का इस्तेमाल करता है, जिसमें कैरी बैग से लेकर पैक्ड सामान तक सब कुछ शामिल है, लेकिन सिर्फ़ सिंगल-यूज़ प्लास्टिक कचरे की मात्रा लगभग 4 किलोग्राम हैं। भारत में फेंके जाने वाले लगभग 9.3 मिलियन टन प्लास्टिक कचरे में से 43 प्रतिशत से ज़्यादा सिंगल-यूज़ प्लास्टिक होता हैं। लगभग 19 प्रतिशत कचरा इकट्ठा नहीं हो पाता, वो कचरा खुले में चले जाता हैं। चीन और अमेरिका के बाद, भारत दुनिया भर में तीसरा सबसे ज़्यादा सिंगल-यूज़ प्लास्टिक कचरा पैदा करने वाला देश हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नियम लागू किए हैं फिर भी सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर लगी रोक का उल्लंघन किया जाता हैं। महाराष्ट्र दक्षिण एशिया में म्युनिसिपल ठोस कचरा पैदा करने वाला सबसे बड़ा राज्य बनकर उभरा हैं। केरलम समुद्री तट व पर्यटन स्थल होने के बावजूद हर साल 130,000 टन से ज़्यादा प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, जिसमें से सिर्फ़ 3 फीसदी ही रीसायकल होता हैं। भारत में प्लास्टिक कचरा व्यवस्थापन मार्केट 2030 तक 2.33 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान हैं। प्लास्टिक कचरा उत्पादक इंडेक्सनुसार, लगभग 98 प्रतिशत सिंगल-यूज़ प्लास्टिक नए फॉसिल फ्यूल से बनता है, अर्थात बिना रीसायकल मटीरियल के बना प्लास्टिक। कुल प्लास्टिक में से एक तिहाई से ज़्यादा सिंगल-यूज़ प्लास्टिक होता है, आज प्लास्टिक हवा, पानी और हमारे शरीर में भी मौजूद हैं।
हमारे देश में लोगों में पायी जाने वाली सबसे बड़ी समस्या लापरवाही और बेफिक्री बेहद ज्यादा हैं। सौ में से दो-चार लोगों को छोड़कर बाकी सभी लोग भेड़ चाल चलने में होशियारी समझते है, किसी भी विषय के बारे में समस्त जानकारी जानने या तर्क-वितर्क सोंचे बगैर केवल खुद का स्वार्थ देखना, लोगों की हाँ में हाँ मिलाना, अनेक बार समस्त जीव सृष्टि को खतरे में डालता हैं। उदाहरण :- कड़े नियम होने के बावजूद बैन प्लास्टिक थैलियों का मार्केट और जनसामान्य के बिच उपयोग दिख रहा हैं। बहुत बार तो दूकानदार के मना करने के बावजूद ग्राहक जबरदस्ती प्लास्टिक थैलियों की मांग करते हैं। अन्य बैन प्लास्टिक सामग्रियों की भी मांग ग्राहकों द्वारा की जाती हैं। लोग या दुकानदार भी यह नहीं सोचते कि उनकी ये गलती पुरे पृथ्वी और जीवों के लिए जानलेवा खतरा हैं। किसी ने सड़क किनारे कचरा फेंका, उसके देखा-देखी सभी वहीं कचरा फेंककर वहां बड़ा कूड़े का ढेर बना देते हैं। कूड़ा न फेंकने की समझाइश देने पर आरोपी लोग लड़ने-झगड़ने भी लगते है, बहुत बार ऐसी नोकझोंक गंभीर अपराधों में भी बदल जाती हैं।
पहले लोग बुरी आदतों या नशे के कारण गंभीर बीमारियों का शिकार होते थे, लेकिन अब प्रदूषण और लोगों की लापरवाही ने छोटे-छोटे मासूम बच्चों और निर्व्यसनी मनुष्यों को भी गंभीर रोगों का शिकार बना दिया हैं। दुग्धजन्य पशु प्लास्टिक थैली खाते है, जलचर प्राणी भी प्लास्टिक का शिकार होते है, पंछी भी प्लास्टिक खाते है, फिर भोजन में इन्ही का मांस या दूध मनुष्य के स्वास्थ्य को बीमार करता हैं। हर प्रकार के प्लास्टिक के बर्तन मार्केट में उपलब्ध है, प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, गर्म पेय और खाद्य सामग्री के लिए भी प्लास्टिक का उपयोग तो कि सीधे कैंसर को न्योता देना हैं। फिर भी लोग नहीं सुधर रहें, जिस कारण आज देश में हर गली-मोहल्ले, रिश्तेदारों, पहचान में कैंसर के रोगी देखने मिल रहे हैं।
अगर पूरे देश को सुधारना है, तो शुरुआत खुद से करनी होंगी। कोई बाहर से हमारी मदद करने नहीं आएंगे। हर विषय पर सजग रहना होगा, खुद के फायदे से पहले पर्यावरण और समाज विकास के नजरिये को ध्यान में रखना होगा। पर्यावरण बचेगा तो ही हम स्वस्थ जी पायेंगे। प्रकृति द्वारा शुद्ध ऑक्सीज़न, जल प्रत्येक जीव के लिए मुफ्त व उस पर समान अधिकार है, लेकिन मानवीय स्वार्थ ने उसे भी दूषित कर दिया है, इस बात की गंभीरता का हमेशा ख्याल रखें। देश में हर क्षेत्र के लिए अधिक कड़े कानूनों की आवश्यकता है, चुनाव में काबिल उम्मीदवार की जीत ही देश का भविष्य बनाती है, इसलिए उम्मीदवार की योग्यता को देखकर वोट दें, अन्य कोई फायदा देखकर नहीं। भ्रष्टाचार और मिलावटखोरी ने देश को बर्बादी के कगार पर ला दिया है, कर्ज के बोझ तले देश और राज्य दब चुके हैं। सरकारी नीति-नियमों का कड़ाई से पालन होना चाहिए। सिर्फ दिखावे के लिए नाममात्र प्लास्टिक बैन है और लोगों में उसका उपयोग धड़ल्ले से चल रहा है, ऐसा नहीं होना चाहिए। लोगों के मन में कानून और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए, तभी प्लास्टिक के जहर से जीवन बचा पायेंगे। अत्यावश्यक और आपातकालीन सेवाओं के अलावा प्लास्टिक का उपयोग पूर्णत बंद होना चाहिए, प्लास्टिक सुविधा के लिए है, लेकिन हमारी अनमोल जान से ज्यादा वो महत्वपूर्ण नहीं हैं।
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