ईरान की लंबी दूरी की मारक क्षमता ने दुनिया को चौंकाया
मिडिल ईस्ट से हिंद महासागर तक फैला युद्ध का भूगोल
डिएगो गार्सिया पर मिसाइल हमले की कोशिश, क्या अब यूरोप भी है खतरे में?
वार डेस्क| BDC News|bhopalonline.org
ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच जारी संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय सीमा तक सीमित नहीं रह गया है। हाल ही में आई वॉशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट ने सनसनी फैला दी है, जिसमें दावा किया गया है कि ईरान ने हिंद महासागर में स्थित अमेरिका और ब्रिटेन के अति-महत्वपूर्ण सैन्य अड्डे ‘डिएगो गार्सिया’ को निशाना बनाने की कोशिश की। यह हमला न केवल सामरिक दृष्टि से बड़ा था, बल्कि इसने ईरान की उस छिपी हुई सैन्य ताकत को भी उजागर कर दिया है, जिसे अब तक दुनिया केवल एक अनुमान मान रही थी।
4000 किलोमीटर की स्ट्राइक: ईरान का अब तक का सबसे साहसी कदम
ईरान के तट से डिएगो गार्सिया की दूरी लगभग 3,800 से 4,000 किलोमीटर है। अब तक ईरान आधिकारिक तौर पर यह दावा करता रहा था कि उसकी मिसाइलों की ऊपरी सीमा 2,000 किलोमीटर है। लेकिन इस हमले की कोशिश ने यह साबित कर दिया है कि तेहरान की पहुंच उससे कहीं अधिक दूर तक है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, दो मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों से इस बेस को निशाना बनाया गया। हालांकि, तकनीक खराबी और अमेरिकी नेवी के SM-3 इंटरसेप्टर की मुस्तैदी के कारण मिसाइलें अपने लक्ष्य पर नहीं लग सकीं।
खोर्रमशहर-4 मिसाइल: ईरान का नया ‘ब्रह्मास्त्र’
रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इस हमले में ‘खोर्रमशहर-4’ श्रेणी की मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया था। इस मिसाइल की खासियतें इसे बेहद घातक बनाती हैं:
- पेलोड क्षमता: यह एक टन से अधिक वजन का वॉरहेड (हथियार) ले जाने में सक्षम है।
- क्लस्टर हथियार: इसमें क्लस्टर बम तैनात करने का विकल्प भी मौजूद है।
- पैंतरेबाजी: यह मिसाइल दोबारा वायुमंडल में प्रवेश करते समय अपनी दिशा बदलने (Maneuver) में सक्षम है, जिससे दुश्मन के डिफेंस सिस्टम के लिए इसे ट्रैक करना और नष्ट करना लगभग असंभव हो जाता है।
- तकनीक: इसका डिजाइन उत्तर कोरियाई और सोवियत प्रणालियों से प्रेरित है, जो सादगी और मारक क्षमता का बेजोड़ मेल है।
डिएगो गार्सिया का रणनीतिक महत्व और ईरान की चुनौती
चागोस द्वीपसमूह में स्थित डिएगो गार्सिया को अमेरिका का ‘अभेद्य किला’ माना जाता है।
- लॉजिस्टिक्स हब: लंबी दूरी के मिशनों और भारी बमवर्षक विमानों के लिए मुख्य केंद्र है।
- ऑपरेशनल सपोर्ट: अफगानिस्तान, इराक और खाड़ी देशों में सैन्य अभियानों के लिए यहीं से सहायता भेजी जाती है।
- सुरक्षित दूरी: अब तक माना जाता था कि यह बेस संघर्ष क्षेत्रों से इतनी दूर है कि यहाँ हमला करना नामुमकिन है। ईरान ने इसी धारणा को चुनौती दी है।
यूरोप के लिए खतरे की घंटी: पेरिस और लंदन भी पहुंच में?
ईरान की इस 4,000 किलोमीटर की मारक क्षमता के परिचालन संकेत ने NATO देशों की नींद उड़ा दी है। यदि ईरान डिएगो गार्सिया तक पहुंच सकता है, तो सैद्धांतिक रूप से लंदन, पेरिस और बर्लिन जैसे यूरोपीय शहर भी उसकी मिसाइलों की जद में आ चुके हैं। पश्चिमी देशों के लिए अब यह केवल एक ‘क्षेत्रीय संघर्ष’ नहीं रह गया है, बल्कि एक वैश्विक सुरक्षा संकट बन गया है।
डोनल्ड ट्रंप और अमेरिका की बढ़ती चिंता
यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का दावा है कि अमेरिका अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के करीब है। हालांकि, ईरान की यह नई क्षमता दिखाती है कि वह झुकने के बजाय संघर्ष को और अधिक विस्तार देने के मूड में है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिका अपने इन सुदूर ठिकानों की सुरक्षा के लिए क्या नए कदम उठाता है।
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