राज्यसभा नामांकन खारिज करने के खिलाफ याचिका नामंजूर, चुनाव याचिका दायर करने की मिली छूट
नई दिल्ली।
BDC NEWS | bhopalonline.org
मध्य प्रदेश से कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को खारिज कर दिया है. नटराजन ने रिटर्निंग ऑफिसर (RO) द्वारा उनका नामांकन फॉर्म रद किए जाने के आदेश को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस रिट याचिका पर विचार करने से साफ इन्कार कर दिया. हालांकि, अदालत ने उन्हें जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत स्थापित नियमों के अनुसार ‘चुनाव याचिका’ (Election Petition) दाखिल करने की विकल्प और छूट जरूर दी है.
इन दिग्गजों के बीच कोर्ट में हुई तीखी बहस
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एएस चंदुरकर की पीठ ने इस मामले पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं. अदालत में मीनाक्षी नटराजन की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पैरवी की. वहीं, उनके विरोध में प्रतिपक्षी वकील मुकुल रोहतगी, कनु अग्रवाल, चुनाव आयोग की ओर से डीएस नायडू और मध्य प्रदेश सरकार का पक्ष रखने के लिए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता कोर्ट में मौजूद रहे.
अभिषेक मनु सिंघवी की दलील: अभी सिर्फ समन जारी हुआ, आरोप तय नहीं हुए
नटराजन के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने रिटर्निंग ऑफिसर के नामांकन खारिज करने के फैसले को पूरी तरह गलत ठहराया. उन्होंने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 33ए का हवाला देते हुए कहा….
- कानून के मुताबिक हलफनामे में केवल उन अपराधों का ब्योरा देना अनिवार्य है जिनमें दो साल से अधिक की सजा हुई हो या फिर अदालत द्वारा आरोप (Charges) तय किए जा चुके हों.
- जिस मामले को छिपाने का आधार बनाकर नामांकन रद किया गया है, उसमें कोर्ट ने अभी तक न तो संज्ञान लिया है और न ही आरोप तय किए हैं.
- उस मामले में महज एक निजी शिकायत (Private Complaint) के आधार पर अदालत ने सिर्फ समन जारी किया है, इसलिए इसे छिपाना नामांकन रद करने का आधार नहीं हो सकता.
मुकुल रोहतगी का पलटवार: चुनाव लड़ना मौलिक अधिकार नहीं, याचिका सुनवाई योग्य ही नहीं
प्रतिवादी पक्ष के वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने सिंघवी की दलीलों का कड़ा विरोध करते हुए तकनीकी और संवैधानिक पहलू सामने रखे…
- उन्होंने तर्क दिया कि चुनाव लड़ना एक विधायी या वैधानिक अधिकार है, यह कोई मौलिक अधिकार (Fundamental Right) नहीं है.
- मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर ही संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में सीधे रिट याचिका लगाई जा सकती है, इसलिए यह याचिका यहां सुनवाई योग्य ही नहीं है.
- संविधान का अनुच्छेद 329 स्पष्ट रूप से चुनावी प्रक्रियाओं के बीच ऐसी याचिकाओं पर सुनवाई करने से रोकता है.
- इसके अलावा नियमों के तहत उम्मीदवार को अपने खिलाफ लंबित सभी आपराधिक मामलों की जानकारी देनी होती है, न कि सिर्फ उन मामलों की जिनमें आरोप तय हो चुके हों.
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: संविधान के सिद्धांतों के बाहर जाकर नई व्याख्या संभव नहीं
दोनों पक्षों की लंबी बहस सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि सिंघवी की दलील को स्वीकार कर लिया जाता है, तो एक गलत परंपरा शुरू हो जाएगी. इसके तहत जिन मामलों में नामांकन खारिज होने में स्पष्ट गलती दिखेगी, उन्हें कोर्ट अनुच्छेद 32 या 226 में सुनने लगेगा और बाकी को चुनाव याचिका के लिए भेजेगा.
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा करने का मतलब एक नया सिद्धांत तय करना होगा जिसका जिक्र संविधान के अनुच्छेद 329 में कहीं नहीं है. कोर्ट इस तरह की व्याख्या को बढ़ावा नहीं दे सकता. यह कहते हुए पीठ ने याचिका को सिरे से खारिज कर दिया. हालांकि, राहत के तौर पर कोर्ट ने साफ किया कि उन्होंने केस की मेरिट (गुण-दोष) पर कोई टिप्पणी नहीं की है और नटराजन चाहें तो तय नियमों के तहत बाद में चुनाव याचिका दाखिल कर सकती हैं.
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