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“यूं भी जी सकते हैं” नाटक:’रियलिस्टिक अप्रोच’ और प्रयोगधर्मी सेट भाया दर्शकों को

"यूं भी जी सकते हैं" "यूं भी जी सकते हैं"
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एंटरटेंमेंट डेस्क|BDC News| bhopalonline.org

भोपाल की नाट्य संस्था पहल इंप्रिंट कल्चर सोसाइटी द्वारा हाल ही में प्रसिद्ध लेखक कृष्ण बलदेव वैद के नाटक “यूं भी जी सकते हैं” का सफल मंचन किया गया। एल चेतना थिएटर, नीलबड़ में आयोजित इस नाटक को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से प्रस्तुत किया गया। तीन महीने के कड़े पूर्वाभ्यास के बाद भोपाल में पहली बार मंचित यह नाटक अपनी ‘रियलिस्टिक अप्रोच’ और प्रयोगधर्मी सेट के कारण दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

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नाटक का कथानक और संदेश

नाटक की कहानी अखिल और गीता के इर्द-गिर्द घूमती है, जो आधुनिक दौर के युवाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। अखिल अपनी होने वाली पत्नी गीता की बहन सुजाता के प्रति आकर्षित है, वहीं गीता अखिल के दोस्त सुमित को पसंद करती है। सुमित के सुझाव पर कि सभी को अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीना चाहिए, अखिल पहले तो असहमत होता है, लेकिन बाद में वह और गीता अलग होने का फैसला कर लेते हैं।

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नाटक का मार्मिक अंत तब होता है जब अखिल और गीता को पता चलता है कि जिन लोगों के लिए उन्होंने अपना रिश्ता दांव पर लगाया, वे अब किसी और के साथ खुश हैं। यह नाटक वर्तमान समय में प्रेम की बदलती परिभाषा, जल्दबाजी में लिए गए फैसलों और रिश्तों में बढ़ते स्वार्थ पर गहरा प्रहार करता है। लेखक ने दर्शाया है कि प्रगतिशील होने की दौड़ में हम रिश्तों और भावनाओं के मामले में कितने पिछड़ते जा रहे हैं।

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मंच और कलाकार

निर्देशक तनाजी के कुशल निर्देशन में कलाकारों ने अपने अभिनय से रिश्तों की जटिलताओं को बखूबी जीवंत किया। मंच पर अखिल के रूप में संदीप पाटिल, गीता के रूप में जूली प्रिया, सुमित के रूप में उद्देश्य अगरैया, सुजाता के रूप में रिया सिंह (दुर्गा) और धीरू के रूप में प्रदीप डोंगरे ने मुख्य भूमिकाएं निभाईं।

मंच सज्जा और तकनीकी पक्ष ने नाटक के प्रभाव को और गहरा बनाया:

  • मंच परिकल्पना: दिनेश नायर
  • संगीत: स्कन्द और आदित
  • प्रकाश: काव्य
  • रूप सज्जा व सामग्री: अमित और अमित कीर

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