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रंगमंच समीक्षा: ठहाकों के बीच सामाजिक विसंगतियों पर कटाक्ष करते ‘किराये जा कांधी’ और ‘बारनि जा सपना’

रंगमंच समीक्षा: ठहाकों के बीच सामाजिक विसंगतियों पर कटाक्ष करते ‘किराये जा कांधी’ और ‘बारनि जा सपना’

संत हिरदाराम नगर (भोपाल)।
BDC News | bhopalonline.org
रवि नाथानी (कला समीक्षक)

राजधानी के उपनगर संतनगर में रंगमंच की दुनिया उस समय जीवंत हो उठी, जब वीना कला सेवा समिति द्वारा दो यादगार सिंधी नाटकों— ‘किराये जा कांधी’ और ‘बारनि जा सपना’ का मंचन किया गया। संत हिरदाराम ऑडिटोरियम में आयोजित इस शाम ने न केवल सिंधी भाषा की मिठास बिखेरी, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक ताने-बाने को हास्य के साथ पिरोकर दर्शकों को आत्मचिंतन पर भी मजबूर किया।

कथानक और निर्देशन: संवेदना और हास्य का संगम

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शाम की शुरुआत वरिष्ठ साहित्यकार भगवान बाबाणी द्वारा लिखित नाटक ‘किराये जा कांधी’ से हुई। यह नाटक समाज की एक कड़वी सच्चाई को हास्य के पुट के साथ पेश करता है, जहाँ रिश्तों की औपचारिकता और दिखावे पर तीखा प्रहार किया गया है। वहीं, युवा कलमकार राकेश शेवानी के नाटक ‘बारनि जा सपना’ ने आधुनिक पारिवारिक परिवेश और बच्चों की आकांक्षाओं को बखूबी पर्दे पर उतारा।

दोनों नाटकों का निर्देशन अनुभवी रंगकर्मी और सिंधी साहित्य अकादमी के पूर्व निदेशक अशोक बुलाणी ने किया। बुलाणी का निर्देशन मंझे हुए खिलाड़ी की तरह रहा, जिन्होंने मंच की सीमाओं का उपयोग करते हुए हास्य (Humor) और भावुकता के बीच एक सटीक संतुलन बनाए रखा।

अभिनय: मंच पर किरदारों की जान

कलाकारों की टोली ने अपने अभिनय से ऑडिटोरियम को ठहाकों से गुंजायमान कर दिया। गुल पहलाजणी और मीना पहलाजणी की जुगलबंदी ने मंच पर सहजता बिखेरी, तो वहीं विजय ज्ञानचंदाणी और ज्योति चावला ने अपने संवाद अदायगी से दर्शकों को बांधे रखा।

युवा कलाकार राकेश शेवानी, कमलेश नाथाणी, और सुरेश चंदानी के अभिनय में ऊर्जा दिखी, जबकि भावना जगवाणी, सरिता ख्याणी और कल्पना चंदाणी ने अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया। छोटे कलाकारों— तन्मय वासवानी, हिमांशी ठाकुरानी, कृष शेवानी और लक्ष् मूलचंदानी की उपस्थिति ने नाटक में ताजगी भर दी।

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सहयोग और संस्कृति का संरक्षण

इस गरिमामयी आयोजन में संत हिरदाराम गर्ल्स कॉलेज और सेवा सदन नेत्र चिकित्सालय का तकनीकी एवं परिसर सहयोग सराहनीय रहा। ऐसे आयोजन न केवल मनोरंजन करते हैं, बल्कि सिंधी साहित्य और रंगमंच की समृद्ध विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का सेतु भी बनते हैं।

कुल मिलाकर, वीना कला सेवा समिति की यह प्रस्तुति अभिनय, लेखन और निर्देशन का एक ऐसा उत्कृष्ट कोलाज रही, जिसने दर्शकों के “हंस-हंस कर पेट में दर्द” कर दिया, लेकिन दिल में अपनी संस्कृति के प्रति एक गहरी छाप छोड़ दी।


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