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    ‘वॉकओवर’ का दाग और लोकतंत्र में लापरवाही की कीमत

    ‘वॉकओवर’ का दाग और लोकतंत्र में लापरवाही की कीमत
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    BDC NEWS | bhopalonline.org

    मध्य प्रदेश की राजनीति में जून 2026 का यह हफ्ता एक बड़े राजनीतिक सबक के रूप में याद रखा जाएगा। राज्यसभा की तीसरी सीट, जो विशुद्ध रूप से अंकगणित के लिहाज से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की जेब में थी, वह एक तकनीकी चूक और बीजेपी की रणनीतिक घेराबंदी के कारण सत्ताधारी दल की झोली में जा गिरी। कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र खारिज होना केवल एक उम्मीदवार की अयोग्यता का मामला नहीं है, बल्कि यह देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल के भीतर छाई सांगठनिक शिथिलता और ‘ओवरकॉन्फिडेंस’ (अत्यधिक आत्मविश्वास) का एक और जीता-जागता प्रमाण है।

    लापरवाही की भारी राजनीतिक कीमत

    संख्या बल के हिसाब से कांग्रेस के पास 62 विधायक हैं, जबकि जीत के लिए महज 58 वोटों की दरकार थी। यानी सीट सुरक्षित थी। लेकिन राजनीति में जो लड़ाई जमीन पर लड़ी जाती है, वैसी ही एक समानांतर लड़ाई कागजों और नियमों के दायरे में भी होती है। हैदराबाद कोर्ट में लंबित एक कथित मामले की जानकारी नामांकन पत्र में न देना या उसे छुपाना, एक ऐसी आत्मघाती चूक है जिसे आधुनिक चुनावी प्रबंधन के दौर में ‘अक्षम्य’ माना जाएगा।

    जब विपक्षी दल लगातार सत्ता पक्ष पर केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप लगाता हो, तब उसे अपने हर कदम पर चौगुनी सावधानी बरतनी चाहिए। मीनाक्षी नटराजन जैसी वरिष्ठ और अनुभवी नेत्री के नामांकन में ऐसी बुनियादी कमी रह जाना यह दिखाता है कि कांग्रेस की लीगल और स्क्रूटनी टीम ने अपने हिस्से का होमवर्क ठीक से नहीं किया था।

    रनवे का ड्रामा और बिखरता नैरेटिव

    नामांकन खारिज होने के बाद भोपाल एयरपोर्ट पर जो हाई-वोल्टेज ड्रामा हुआ—विधायकों के विमान को रनवे से वापस बुलाना, सरकार पर विमान रोकने के आरोप मढ़ना—वह दरअसल उस राजनीतिक घबराहट और हताशा का प्रदर्शन था, जो मैच शुरू होने से पहले ही ‘वॉकओवर’ देने की मजबूरी से पैदा हुई है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और सज्जन सिंह वर्मा का यह तर्क कि वे इस फैसले के खिलाफ अदालत जाएंगे, कानूनी रूप से उनका अधिकार हो सकता है, लेकिन राजनीतिक मोर्चे पर जो नुकसान होना था, वह हो चुका है।

    अब नाम वापसी की तारीख (11 जून) बीतते ही भाजपा के तीनों उम्मीदवारों—तरुण चुघ, रजनीश अग्रवाल और महेश केवट—का निर्विरोध चुना जाना तय है। भाजपा ने बिना एक भी अतिरिक्त वोट खर्च किए, कांग्रेस की थाली से तीसरी सीट खींच ली। यह भाजपा के चुनावी चातुर्य और विपक्षी कमजोरियों को तुरंत भांप लेने की उसकी अचूक क्षमता को दर्शाता है।

    बहिष्कार और अदालती लड़ाई: सिर्फ एक सांत्वना पुरस्कार?

    कांग्रेस भले ही अब चुनाव के बहिष्कार की बात करे या अदालत के दरवाजे खटखटाए, लेकिन जनता के बीच जो संदेश गया है, वह बेहद निराशाजनक है। संसद के उच्च सदन (राज्यसभा) में विपक्ष की एक सीट और कम हो जाएगी, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर भी उसकी आवाज कमजोर होगी।

    बड़ा सवाल: इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस के कैडर और उसके विधायकों के मनोबल को तगड़ा झटका दिया है। विधायकों को पाले में रखने के लिए बेंगलुरू भेजने की जो छटपटाहट कांग्रेस में दिख रही थी, उसने यह भी साफ कर दिया कि पार्टी के भीतर अविश्वास की खाई कितनी गहरी है। मध्य प्रदेश का यह राज्यसभा घटनाक्रम विपक्ष के लिए एक कड़ा सबक है। लोकतंत्र में केवल जनता का समर्थन या विधायकों का आंकड़ा होना ही काफी नहीं है; चुनावी प्रक्रिया के नियमों के प्रति सजगता और प्रशासनिक मोर्चे पर मुस्तैदी भी उतनी ही जरूरी है। जब तक विपक्ष इन बारीकियों को गंभीरता से नहीं लेगा, वह सत्ता पक्ष को ऐसे ही ‘वॉकओवर’ देता रहेगा और फिर ‘साजिश’ का रोना रोने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं बचेगा।



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