स्वतंत्रता संग्राम में मध्य प्रदेश के साहित्यकारों और कवियों की भूमिका
BDC NEWS| bhopalonline.org
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में मध्य प्रदेश का योगदान केवल तलवारों और युद्ध के मैदान तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इस पावन धरा ने ऐसे ओजस्वी रचनाकार और कवि भी दिए जिनकी कला ने क्रांतिकारियों की रगों में देशप्रेम का नया संचार किया। जब पूरा देश अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब मध्य प्रदेश की भूमि से उठे आजादी के तराने (गीत और कविताएं) जन-जन के लिए प्रेरणा का मुख्य स्रोत बन गए थे।
माखनलाल चतुर्वेदी और ‘पुष्प की अभिलाषा’
होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) जिले के बाबई में जन्मे पंडित माखनलाल चतुर्वेदी, जिन्हें ‘एक भारतीय आत्मा’ के नाम से भी जाना जाता है, ने अपनी पैनी और ओजस्वी कलम से ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी। उनकी अधिकांश कविताएं जेल की कालकोठरी में रची गईं जो आगे चलकर देश की आजादी का अमर नारा बन गईं। उनकी विश्व प्रसिद्ध कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ को भारतीय साहित्य का सबसे बड़ा आजादी का तराना माना जाता है। बिलासपुर जेल में लिखी गई इन पंक्तियों— “चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ… मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जावें वीर अनेक॥”—ने हर स्वतंत्रता सेनानी के भीतर अदम्य साहस भर दिया था।
सुभद्रा कुमारी चौहान का क्रांतिकारी ओज
भले ही सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म प्रयागराज में हुआ था, लेकिन उनका मुख्य कर्मक्षेत्र मध्य प्रदेश का जबलपुर रहा। वे जबलपुर से वर्ष 1923 में आयोजित ऐतिहासिक ‘झंडा सत्याग्रह’ का नेतृत्व करने वाली देश की पहली महिला सत्याग्रही थीं। बुंदेलखंड की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर रचित उनकी कविता ‘झांसी की रानी’ (बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी) ने पूरे भारत में क्रांति का शंखनाद कर दिया था। इसके साथ ही, उनका गीत ‘वीरों का कैसा हो वसंत’ स्वतंत्रता सेनानियों और युवाओं को देश के लिए सब कुछ न्यौछावर करने की प्रेरणा देता था।
बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ और लोककवि ईसुरी के तराने
शाजापुर के भयाना में जन्मे प्रसिद्ध कवि बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ के गीतों में विद्रोह और क्रांति की तीखी गूंज सुनाई देती थी। उनकी प्रसिद्ध रचना ‘कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाए’ ने गुलाम भारत के समाज को गहरी नींद से जगाने और दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने का खुला आह्वान किया था। इसके अतिरिक्त, 1857 की क्रांति के दौरान मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड और मालवा अंचल में लोककवि ईसुरी की फागों और स्थानीय गीतों ने जनता को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई।
राजा शंकर शाह के बलिदान और आल्हा-ऊदल गायन
महाकौशल क्षेत्र के जबलपुर के गोंड शासक राजा शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह ने अंग्रेजों के विरुद्ध जो ओजस्वी कविताएं रचीं, वे आज भी अमर हैं। उनकी एक विद्रोही पंक्ति अंग्रेजों को इतनी नागवार गुजरी कि उन्हें तोप के सामने बांधकर उड़ा दिया गया था। वहीं, बुंदेलखंड अंचल में जगनिक द्वारा रचित ‘आल्हा खंड’ का वीर रस से भरपूर काव्य— “बारह बरस लौ कूकुर जीवै…”—क्रांतिकारियों के बीच जोश भरने का सबसे बड़ा माध्यम था। इन सभी साहित्यकारों और उनके गीतों ने मध्य प्रदेश की धरती को स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण वैचारिक केंद्र बना दिया।
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