मध्य प्रदेश का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में स्वर्णिम और अमूल्य योगदान
BDC NEWS | bhopalonline.org
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में मध्य प्रदेश का योगदान अत्यंत गौरवशाली और अमूल्य रहा है। इस पावन भूमि पर स्वतंत्रता की अलख बहुत पहले ही जग चुकी थी। इसकी शुरुआत 1824 में कुँवर चैनसिंह के ऐतिहासिक विद्रोह से हुई, जिसके बाद 1857 की महान क्रांति और राष्ट्रीय स्तर के सविनय अवज्ञा व जंगल सत्याग्रहों ने देश की आजादी की लड़ाई को एक नई दिशा दी। मध्य प्रदेश के वीरों ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए जो बलिदान दिए, वे आज भी हर भारतीय के दिल में देशभक्ति की भावना जगाते हैं।
1857 की क्रांति और मध्य प्रदेश के प्रमुख सेनानी
मध्य प्रदेश में 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की गूंज दूर-दूर तक सुनाई दी थी। इस विद्रोह की औपचारिक शुरुआत राज्य में 3 जून 1857 को मुहम्मद अली बेग के नेतृत्व में नीमच छावनी से हुई थी। इसके अलावा, गढ़मंडला के शासक राजा शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह ने अंग्रेजों के खिलाफ गुप्त योजना तैयार की थी, जिसके चलते उन्हें 18 सितंबर 1857 को तोप से उड़ाकर शहीद कर दिया गया। मंडला क्षेत्र में रामगढ़ की प्रतापी रानी अवंतीबाई ने मुक्ति आंदोलन का नेतृत्व किया और 1858 में वीरगति को प्राप्त हुईं। इसी प्रकार, ग्वालियर में अंग्रेजों से भीषण मुकाबला करते हुए 18 जून 1858 को महारानी लक्ष्मीबाई ने अपने प्राणों की आहुति दी, जबकि महान क्रांतिकारी तात्या टोपे को 18 अप्रैल 1859 को शिवपुरी में अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया।
जनजातीय नायक और अन्य अमर क्रांतिकारी
मध्य प्रदेश के जंगलों और अंचलों से कई महान जनजातीय योद्धाओं ने ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। टंट्या भील, जिन्हें आदर के साथ ‘टंट्या मामा’ और आदिवासियों का ‘रॉबिनहुड’ कहा जाता है, ने कम उम्र से ही अंग्रेजों के खिलाफ कड़ा संघर्ष किया। भीमा नायक ने सेंधवा और सतपुड़ा क्षेत्र में 1857 के विद्रोह के साथ-साथ प्रसिद्ध अंबा पानी युद्ध का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया। धार जिले के अमझेरा के राजा बख्तावर सिंह ने भी अंग्रेजों का पुरजोर विरोध किया और उन्हें 1858 में इंदौर में फांसी दे दी गई। इन सभी जनजातीय नायकों ने अपनी वीरता से स्वतंत्रता संग्राम को एक जन-आंदोलन का रूप दिया।
राष्ट्रीय आंदोलन, झंडा सत्याग्रह और जंगल सत्याग्रह
मध्य प्रदेश की धरती ने राष्ट्रीय स्तर के आंदोलनों में भी अग्रिम भूमिका निभाई। वर्ष 1923 में जबलपुर से शुरू हुआ ‘झंडा सत्याग्रह’ राष्ट्रीय सम्मान और स्वाभिमान का एक बहुत बड़ा केंद्र बनकर उभरा। इसके अतिरिक्त, ब्रिटिश सरकार की दमकारी वन नीतियों के खिलाफ आदिवासियों और स्थानीय नागरिकों ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करते हुए ‘जंगल सत्याग्रह’ किए, जिनमें सिवनी और बैतूल के घोड़ाडोंगरी क्षेत्र अत्यंत प्रमुख रहे। इन सत्याग्रहों ने जनता के बीच राजनीतिक चेतना को जागृत करने का काम किया।
चंद्रशेखर आजाद का जन्म और भोपाल-मालवा का योगदान
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे महान और अमर क्रांतिकारियों में से एक, अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद का जन्म मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के ऐतिहासिक भावरा गांव में हुआ था। आजाद ने अपने साहसिक और क्रांतिकारी कदमों से ब्रिटिश साम्राज्य को हिला कर रख दिया था। इस प्रकार, कुँवर चैनसिंह से लेकर चंद्रशेखर आजाद तक और नीमच से लेकर जबलपुर तक, मध्य प्रदेश के चप्पे-चप्पे पर स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष की अनगिनत दास्तानें दर्ज हैं, जो हमारी भावी पीढ़ियों को हमेशा राष्ट्र सेवा के लिए प्रेरित करती रहेंगी।