संजय तिवारी
BDC News | bhopalonline.org
हर साल 1 मई को दुनिया भर में ‘मजदूर दिवस’ मनाया जाता है। शिकागो के हेमार्केट शहीद स्मारक से शुरू हुआ ‘8 घंटे काम’ का संघर्ष आज भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में एक नई शक्ल अख्तियार कर चुका है। जहाँ सरकारें नए ‘लेबर कोड’ के जरिए विकास के दावे कर रही हैं, लेकिन ये बदलाव मजदूरों को सशक्त बनाने के बजाय उन्हें संरक्षणहीन बना रहे हैं।
कानूनी भूलभुलैया: सुधारीकरण या सरलीकरण?
भारत सरकार ने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को समाहित कर चार नए श्रम कोड (मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक संबंध और व्यावसायिक सुरक्षा) तैयार किए हैं। सरकार का दावा है कि इससे ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ बढ़ेगा और निवेश आएगा। लेकिन अगर हम इन कानूनों की सूरत को गहराई से देखें, तो कई चिंताजनक पहलू सामने आते हैं:
फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट: असुरक्षित भविष्य
नए कानूनों में ‘फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट’ को बढ़ावा दिया गया है। इसका सीधा मतलब है कि अब कंपनियां लंबी अवधि के रोजगार के बजाय छोटे कॉन्ट्रैक्ट पर काम कराएंगी। इससे मजदूरों में छंटनी का डर हमेशा बना रहेगा और वे कभी भी ‘स्थायी कर्मचारी’ के लाभ (जैसे पेंशन या ग्रेच्युटी) नहीं ले पाएंगे।
12 घंटे की शिफ्ट का कानूनी जाल
नए प्रावधानों के तहत कार्यस्थल पर काम के घंटों को लचीला बनाया गया है। कई राज्यों ने पहले ही 12 घंटे की शिफ्ट के प्रस्तावों को हरी झंडी दिखाई है। विशेषज्ञों का तर्क है कि इससे मजदूरों के स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, और यह 1886 के उस संघर्ष का अपमान है जिसने ‘8 घंटे’ का नियम तय किया था।
असंगठित क्षेत्र: कानून की पहुंच से बाहर
भारत का लगभग 90% श्रम बल असंगठित क्षेत्र (Unorganized Sector) में काम करता है। इसमें खेतिहर मजदूर, निर्माण श्रमिक, घरेलू कामगार और अब बड़ी संख्या में ‘गिग वर्कर्स’ (डिलीवरी बॉय, कैब ड्राइवर) शामिल हैं।
- गिग इकोनॉमी का शोषण: जोमैटो, स्विगी और उबर जैसे प्लेटफॉर्म्स के लिए काम करने वाले लाखों युवाओं को ‘पार्टनर’ कहा जाता है, ‘कर्मचारी’ नहीं। इस शब्दावली के खेल के कारण उन्हें न तो न्यूनतम मजदूरी का लाभ मिलता है और न ही बीमा या दुर्घटना लाभ।
- प्रवासी मजदूरों का दर्द: 2020 के लॉकडाउन ने प्रवासी मजदूरों की लाचारी को पूरी दुनिया के सामने रखा था। आज भी, अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिक कानून का क्रियान्वयन इतना लचर है कि किसी दुर्घटना या मृत्यु की स्थिति में उनके परिवार को न्याय मिलना लगभग असंभव होता है।
न्यूनतम मजदूरी: महंगाई की मार और सरकारी आंकड़े
सरकार अक्सर औसत मजदूरी बढ़ने का दावा करती है, लेकिन वास्तविक मजदूरी (Real Wage) की स्थिति भयावह है। बढ़ती महंगाई के अनुपात में न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण नहीं होना मजदूरों को गरीबी के दुष्चक्र में धकेल रहा है।
“जब दाल ₹200 किलो हो और तेल के दाम आसमान छू रहे हों, तब ₹300-₹400 की दिहाड़ी पर एक परिवार का भरण-पोषण करना कानून की नहीं, बल्कि मजदूर के जिजीविषा की जीत है।”
ट्रेड यूनियनों का कमजोर होना
लोकतंत्र में मजदूरों की आवाज उठाने का सबसे बड़ा माध्यम ट्रेड यूनियन होते हैं। नए औद्योगिक संबंध कोड (Industrial Relations Code) के तहत कंपनियों के लिए बंद करना या छंटनी करना आसान बना दिया गया है। साथ ही, हड़ताल करने की शर्तों को इतना कड़ा कर दिया गया है कि अब विरोध दर्ज कराना भी कानूनी अपराध की श्रेणी में आ सकता है। यह ‘सामूहिक सौदेबाजी’ (Collective Bargaining) की शक्ति को खत्म करने जैसा है।
उत्सव नहीं, आत्मचिंतन का दिन
मजदूर दिवस केवल रैलियों और भाषणों का दिन नहीं होना चाहिए। यह दिन है उन हाथों की सुध लेने का जो देश की जीडीपी की नींव रखते हैं। जब तक कानून केवल कॉर्पोरेट हितों को साधने के लिए बनाए जाएंगे और ‘वेलफेयर स्टेट’ की अवधारणा से दूर हटेंगे, तब तक मजदूर दिवस की सार्थकता अधूरी रहेगी। हमें ‘स्मार्ट सिटी’ के साथ-साथ ‘सुरक्षित श्रमिक’ की भी आवश्यकता है।
लेखक : श्रमिक नेता रहे हैं।
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