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मोहन का मंत्रालय: कलेक्टर की ‘रील’ बनाम नेताओं की ‘पील’, मंत्रालय में फाइल की ‘बुलेट ट्रेन’ और सियासी संग्राम

मोहन का मंत्रालय: कलेक्टर की ‘रील’ बनाम नेताओं की ‘पील’, मंत्रालय में फाइल की ‘बुलेट ट्रेन’ और सियासी संग्राम

आशीष चौधरी…. हर मंगलवार

कलेक्टर साहब की ‘रील’ बनाम नेताओं की ‘पील’

विंध्य के एक नवागत कलेक्टर साहब इन दिनों ‘मंत्रालय’ से लेकर ‘मेटा’ (फेसबुक-इंस्टाग्राम) तक छाए हुए हैं। साहब जनसुनवाई में ऐसे घुल-मिल रहे हैं कि जनता को उनमें अपना ‘मसीहा’ और नेताओं को अपना ‘प्रतिद्वंद्वी’ नज़र आने लगा है। पुराने जिले में भी साहब अपनी इसी कार्यशैली और कैमरामैन के लिए मशहूर थे। अब नए जिले में विंध्य की भोली जनता तो वाह-वाही कर रही है, लेकिन क्षेत्र के माननीयों का रक्तचाप बढ़ गया है। डर यह है कि अगर कलेक्टर साहब ही सारे ‘लाइक’ और ‘फॉलोअर्स’ बटोर लेंगे, तो फिर चुनाव में नेताओं के हिस्से क्या सिर्फ़ ‘ब्लॉक’ होना बचेगा?

फाइल की ‘बुलेट ट्रेन’

मंत्रालय में वैसे तो रिटायरमेंट के बाद संविदा की फाइल कछुए की रफ्तार से चलती है, लेकिन कुछ ‘खास’ लोगों के लिए नियम-कायदे भी ट्रैक बदल लेते हैं। पिछले दिनों एक डिप्टी सेक्रेटरी साहब रिटायर हुए। अभी विदाई की मिठाई भी नहीं बंटी थी कि ‘चौथी मंजिल’ (शक्ति केंद्र) से फोन आ गया—”आप कहीं नहीं जा रहे!” फिर क्या था, संविदा नियुक्ति की फाइल पर ऐसे पंख लगे कि वह मंत्रालय के इतिहास की सबसे तेज दौड़ने वाली फाइल बन गई। कैबिनेट की मंजूरी ऐसी मिली जैसे कोई इमरजेंसी रेस्क्यू ऑपरेशन हो। इसे कहते हैं योग्यता की कद्र… या शायद ‘जरूरी राज’ को सहेजने की कला!

मान्यता का ‘संग्राम’ और आईएएस की साख

कर्मचारी संगठनों में वर्चस्व की जंग अब पुलिस थाने की देहलीज़ तक जा पहुंची है। सामान्य प्रशासन विभाग ने एक गुट को मान्यता क्या दी, दूसरे गुट वाले आईएएस साहब के ‘लीडरशिप’ पर ही सवाल खड़े हो गए। एक गुट को सत्ता का वरदहस्त प्राप्त है, ताकि ‘क्षेत्र विशेष’ के नेताजी को खुश रखा जा सके। वहीं दूसरे गुट के मुखिया अपने ‘बड़बोलेपन’ के कारण सरकार की गुड-बुक्स से बाहर हैं। अब मंत्रालय की सीढ़ियों पर चर्चा है कि ये संगठन कर्मचारियों का भला करेंगे या आपस में ही ‘कुश्ती’ लड़कर मनोरंजन?

सूचना आयोग: एक अनार, दो बीमार… तीसरा कौन?

राज्य सूचना आयोग में तीन पदों के लिए विज्ञापन निकला था, लेकिन ‘सिलेक्ट’ सिर्फ दो ही हुए। दोनों नवनियुक्त आयुक्तों ने मुख्यमंत्री से मिलकर अपनी हाजिरी बजा दी है और शपथ की तैयारी है। पर सवाल वही है—’वो तीसरा कौन?’ गलियारों में चर्चा है कि तीसरी कुर्सी किसी बहुत ही ‘खास’ चेहरे के लिए खाली रखी गई है, जिसकी एंट्री सही मुहूर्त पर होगी। आखिर सस्पेंस बना रहना भी तो राजनीति का हिस्सा है!

चाय की चुस्की और पाला बदलने की ‘खुशबू’

पिछले दिनों मंत्रालय की पांचवीं मंजिल पर एक ताकतवर अफसर और कांग्रेस के दो ‘हाशिए’ वाले दिग्गजों के बीच लंबी गुफ्तगू हुई। बंद कमरे में चाय की चुस्कियां ली गईं और माहौल इतना हल्का था कि बाहर खड़े सुरक्षाकर्मियों को भी ‘महक’ आ गई। एक नेताजी इस्तीफा दे चुके हैं, दूसरे को संगठन भाव नहीं दे रहा। अब इस ‘गुपचुप’ मुलाकात के बाद अटकलें तेज हैं कि क्या विपक्ष का ये ‘कद्दावर’ हाथ अब ‘कमल’ थामने की तैयारी में है? क्योंकि साहब, राजनीति में मुलाकातें बेवजह नहीं होतीं!

मंत्रीजी का ‘प्रोजेक्ट’ पास, डॉक्टर ‘फेल’

कहते हैं ‘दीया तले अंधेरा’ होता है, लेकिन यहाँ तो दीया ही बुझा हुआ है। प्रदेश के एक रसूखदार मंत्रीजी के गृह क्षेत्र में उनके ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ ने तो आकार ले लिया, लेकिन वहां की जनता एक अदद डॉक्टर के लिए तरस रही है। विडंबना देखिए, मंत्रीजी खुद विभाग के मुखिया हैं, पर उनके आश्वासन ‘हवाई’ साबित हो रहे हैं। जब गृह क्षेत्र का ये हाल है, तो प्रदेश के बाकी स्वास्थ्य केंद्रों का भगवान ही मालिक है। मंत्रीजी, प्रोजेक्ट्स की चमक अच्छी है, पर जनता की धड़कनें भी तो सुनिए!



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