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    हनुमान चालीसा और शनि देव की आरती संग्रह

    हनुमान चालीसा और शनि देव की आरती
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    Shani Dev Ji Ki Aarti Lyrics In Hindi: शनि देव को खुश रखने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए, प्रत्येक शनिवार को पूजा करना और शनि देव की आरती करना अच्छा होता है। शनि देव की आरती गाने से घर में सुख-समृद्धि आती है।

    शनि देव को न्याय के देवता के रूप में जाना जाता है। उनके विशेष ध्यान में व्यक्ति के कर्मों का हिसाब रहता है। जब शनि देव किसी पर देखते हैं, तो उनके कर्मों का परिणाम मिलता है। उनकी दृष्टि से लोग डर जाते हैं, चाहे वह इंसान हों या देवता। कुछ देवताओं के भक्तों को शनि देव संभावित परेशान नहीं करते हैं, जैसे कि हनुमान जी। मान्यता है कि हनुमान जी के भक्तों को शनि देव स्वयं परेशान नहीं करते। इसलिए शनिवार को हनुमान चालीसा का पाठ करने से शनि के दोष से मुक्ति मिल सकती है और उनकी पीड़ा से राहत मिल सकती है।

    हनुमान चालीसा लिरिक्स हिंदी

    श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
    बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।
    बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
    बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।

    जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
    जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।

    रामदूत अतुलित बल धामा।
    अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।

    महाबीर बिक्रम बजरंगी।
    कुमति निवार सुमति के संगी।।

    कंचन बरन बिराज सुबेसा।
    कानन कुंडल कुंचित केसा।।

    हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
    कांधे मूंज जनेऊ साजै।

    संकर सुवन केसरीनंदन।
    तेज प्रताप महा जग बन्दन।।

    विद्यावान गुनी अति चातुर।
    राम काज करिबे को आतुर।।

    प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
    राम लखन सीता मन बसिया।।

    सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।

    बिकट रूप धरि लंक जरावा।।

    भीम रूप धरि असुर संहारे।
    रामचंद्र के काज संवारे।।

    लाय सजीवन लखन जियाये।
    श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।

    रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
    तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।

    सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
    अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।

    सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
    नारद सारद सहित अहीसा।।

    जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
    कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।

    तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
    राम मिलाय राज पद दीन्हा।।

    तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
    लंकेस्वर भए सब जग जाना।।

    जुग सहस्र जोजन पर भानू।
    लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

    प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
    जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।

    दुर्गम काज जगत के जेते।
    सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।

    राम दुआरे तुम रखवारे।
    होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।

    सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
    तुम रक्षक काहू को डर ना।।

    आपन तेज सम्हारो आपै।
    तीनों लोक हांक तें कांपै।।

    भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
    महाबीर जब नाम सुनावै।।

    नासै रोग हरै सब पीरा।
    जपत निरंतर हनुमत बीरा।।

    संकट तें हनुमान छुड़ावै।
    मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।

    सब पर राम तपस्वी राजा।
    तिन के काज सकल तुम साजा।

    और मनोरथ जो कोई लावै।
    सोइ अमित जीवन फल पावै।।

    चारों जुग परताप तुम्हारा।
    है परसिद्ध जगत उजियारा।।

    साधु-संत के तुम रखवारे।

    असुर निकंदन राम दुलारे।।

    अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
    अस बर दीन जानकी माता।।

    राम रसायन तुम्हरे पासा।
    सदा रहो रघुपति के दासा।।

    तुम्हरे भजन राम को पावै।
    जनम-जनम के दुख बिसरावै।।

    अन्तकाल रघुबर पुर जाई।
    जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।।

    और देवता चित्त न धरई।
    हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।

    संकट कटै मिटै सब पीरा।
    जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।

    जै जै जै हनुमान गोसाईं।
    कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।

    जो सत बार पाठ कर कोई।
    छूटहि बंदि महा सुख होई।।

    जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
    होय सिद्धि साखी गौरीसा।।

    तुलसीदास सदा हरि चेरा।
    कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।।

    पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
    राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

    जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।

    सूर्य पुत्र प्रभु छाया महतारी॥

    जय जय श्री शनि देव….

    श्याम अंग वक्र-दृष्टि चतुर्भुजा धारी।

    नी लाम्बर धार नाथ गज की असवारी॥

    जय जय श्री शनि देव….

    क्रीट मुकुट शीश राजित दिपत है लिलारी।

    मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी॥

    जय जय श्री शनि देव….

    मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी।

    लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी॥

    जय जय श्री शनि देव….

    जय जय श्री शनि देव….

    देव दनुज ऋषि मुनि सुमिरत नर नारी।

    विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी॥

    जय जय श्री शनि देव भक्तन हितकारी।।

    जय जय श्री शनि देव….

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