नदियों को जीने दो- तभी वे हमें जीवन देंगी

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भूपेन्‍द्र शर्मा / 9893634566

नदियां जीवन का इतिहास हैं, वर्तमान हैं, भविष्‍य भी। स्‍वार्थवश हमने नदियों से नाता तोड़ लिया। हमें सोचना होगा कि नदियां तो हमें जीवन देती हैं और हम उन्‍हें जीने नहीं देते। यदि आने वाली पीढ़ि‍यों के लिए जीवन की फलीफूली विरासत छोड़ना है, तो हमें नदी की तरह सोचना होगा। हम सबको नदियों की सुरक्षा करना सीखना होगा। नदियों की प्रकृति को, प्राकृतिक मूल्‍य को समझने के अलावा हमारे पास कोई विकल्‍प नहीं है…

प्राणा वै जगतानापो भूतानि भुवनानि च। बहुनात्र किमुक्तेन चराचरमिदं जगतः॥

लिंगपुराण में लिखा है- जल जगत का प्राण है, जिसमें सब भूत एवं भुवन हैं। संपूर्ण चर-अचर जगत के अस्‍तित्‍व का आधार जल ही है। इसलिए हमें यह समझना आवश्‍यक है कि नदियां मात्र जलधाराएं नहीं हैं। ये मानव सभ्यता की जीवन-रेखाएं हैं। ऐेतिहासिक प्रमाण हैं कि विश्‍व की अधिकांश महान सभ्यताएं नदी-तटों पर ही जन्मीं एवं फली-फूलीं। सिंधु घाटी सभ्यता, मिस्र एवं मेसोपोटामिया जैसी प्रमुख सभ्यताओं ने नदियों के पानी का उपयोग कृषि, परिवहन त‍था दैनिक जीवन के लिए किया। नदियां ताज़ा पानी का अनमोल भंडार हैं, जो मानव सहित समस्‍त जीव, जंतु, कीट, पतंग, पशु, पक्षियों एवं पारिस्थितिकी के लिए अनिवार्य हैं। नदी कृषि सिंचाई का बड़ा स्रोत हैं, उद्योगों की जलापूर्ति करती हैं, वहीं परिवहन के सरल, सुलभ मार्ग की भूमिका भी निभाती हैं।

हम भूले ऋषि-मुनियों की पंरपरा

मानव शरीर में युग-युगों से ऋषि-मुनि ने नदियों के किनारे ही ज्ञानार्जन, योग-ध्‍यान किया। ऋषियों ने पर्यावरण संतुलन के दृष्‍ट‍िकोण से ही नदियों, पहाड़ों, वनों एवं पशु-पक्षियों के सहअस्तित्व की अवधारणा विकसित की। उन्‍होंने पाषाण में भी जीवन देखने का मंत्र दिया, जिसके कारण हमारी संस्‍कृति, धर्म में प्रकृति को समझने एवं उसके प्रति सद्व्यवहार रखने की परंपराएं जन्मीं। इतिहास बताता है कि जब तक उस परंपरा का पालन हुआ, मानव जीवन सुचारु, स्‍वस्‍थ, नीरोग एवं सुखमय चला, किंतु बीते 4-5 दशकों से अनियंत्रित विकास एवं बढ़ते औद्योगीकरण की उमंग में हमने प्रकृति के विनाश का बीड़ा उठा लिया- जंगल काट डाले, पहाड़ तोड़ डाले, नदियां खोद डालीं… हम यह भूल गए कि प्रकृति को संकट में डालने का अर्थ है अपने ही जीवन के लिए गंभीर संकट को आमंत्रण।

धरती की जीवनदायिनी हैं सरिताएं

बहुआयामी रूप से उपयोगी नदियां फ्रेश वाटर का प्राथमिक स्रोत हैं। ‘रहिमन पानी रखिए, बिन पानी सब सून…’ नदियों के बिना जीवन की कल्‍पना संभव नहीं। भारत जैसे कृषि-प्रधान देशों में नदियों का पानी सिंचाई के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। उद्योगों की प्राथमिक आवश्‍यकताओं के लिए पानी की आपूर्ति नदियां ही करती हैं। इस्पात, कपड़ा एवं बिजली संयंत्र जैसे उद्योग नदियों के पास ही स्थापित किए जाते हैं। प्राचीनकाल से ही नदियां तथा नहरें परिवहन का सरल-सुलभ माध्‍यम रही हैं। नावों एवं जहाजों के माध्यम से बड़ी मात्रा में सामान का परिवहन संभव होता है, जिससे व्यापार-वाणिज्य को बढ़ावा मिलता है। नदियां जलविद्युत ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत हैं, जो एक स्वच्छ एवं नवीकरणीय ऊर्जा है।

देश की सभी नदियां प्रदूषित

भारत की सबसे लंबी (2525 किमी) प्रवाहित नदी गंगा से लेकर राजस्‍थान के अलवर में बहने वाली देश की सबसे छोटी (45 किमी) नदी अरवरी तक देश की समूची (लगभग 400 नदियां) प्रदूषण का शिकार हैं। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का सर्वाधिक दुष्‍परिणाम नदी एवं पहाड़ों को ही भोगना पड़ा है। सर्वाधिक पवित्र, धार्मिक गंगा-यमुना को ही देखिए। पिछले दो दशक में उन्‍हें प्रदूषण मुक्‍त करने पर लगभग 15 अरब रुपए व्‍यय हो चुके हैं, फिर भी कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना सहित कई स्‍थानों पर गंगाजल आचमन योग्‍य नहीं बचा। इसी प्रकार दिल्ली की 56 प्रतिशत जनता की जीवनदायिनी यमुना का दिल्‍ली, कालपी, हमीरपुर, गोवर्धन, वृंदावन, मथुरा, औरैया, इटावा, आगरा जैसे नगरों में रंग-रूप बिगड़ चुका है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार देशभर के 900 से अधिक शहरों एवं कस्बों का 70 फीसदी गंदा पानी पेयजल की प्रमुख स्रोत नदियों में बिना शोधन के ही छोड़ दिया जाता है। आज देश की 70 प्रतिशत नदियां प्रदूषित हैं तथा विनाश के मार्ग पर हैं। गुजरात की अमलाखेड़ी, साबरमती, खारी, हरियाणा की मारकंडा, उत्तरप्रदेश की काली, हिंडन, आंध्रप्रदेश की मुंसी, दिल्ली में यमुना, महाराष्ट्र की भीमा आदि देश की सर्वाधिक प्रदूषित नदियां हैं।

नदियों से छेड़छाड़ घातक

नदियों के साथ छेड़छाड़-खिलवाड़ के कारण वे अपना प्राकृतिक रूप खो रही हैं, जिससे बाढ़, सूखा एवं प्रदूषण जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। औद्योगिक कचरा, सीवेज, कृषि में प्रयुक्‍त कीटनाशकों का सीधे नदियों में बहाया जाना नदियों को दूषित करने का सबसे बड़ा कारण हैं। भारत की गंगा, यमुना इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। कानपुर में चमड़ा उद्योग का कचरा गंगा नदी में बहाया जाता है, जिससे उसका पानी विषाक्‍त हो गया है। यमुना दिल्ली में प्रवेश करते ही एक नाले के रूप में बदल जाती है। दिल्ली का 80% से अधिक सीवेज बिना उपचार के यमुना में बहाया जाता है। कालपी, हमीरपुर, गोवर्धन, वृंदावन, मथुरा, औरैया, इटावा, आगरा में भी नगरों के सारे नाले-नाली, सीवेजों ने यमुना को नाला बना दिया है। इसी प्रकार नदियों के प्राकृतिक बहाव को अवरुद्ध करना, अवैध खनन, तटबंदी या उनका मार्ग बदलना नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को रोक देता है, जो नदी के लिए तथा जन-जीवन के लिए घातक है।

प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ी संभावना

नदियों के प्राकृतिक व्यवहार में बदलाव से बाढ़ एवं सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं की संभावना बढ़ जाती है। बिहार की कोसी नदी को ‘बिहार का शोक’ कहा जाता है, क्योंकि यह बार-बार मार्ग बदलती है तथा बाढ़ लाती है। वहीं असम की ब्रह्मपुत्र नदी प्रति वर्ष मानसून में उफान पर आती है, जिसके कारण असम में भीषण बाढ़ आती है।

नदियों की मौलिकता बनाए रखने के उपाय

विशेषज्ञ मानते हैं कि नदियों को केवल एक संसाधन के रूप में नहीं, अपि‍तु एक जीवित इकाई के रूप में देखा जाना चाहिए। विशेषज्ञ औद्योगिक कचरे, सीवेज, नगरों के नाले एवं कृषि से निकलने वाले प्रदूषकों को सीधे नदियों में जाने से रोकना अनिवार्य मानते हैं। इसके लिए कठोर कानून बनाना तथा उनका प्रभावी क्रियान्वयन सबसे प्रमुख कार्य है। वहीं भू-वैज्ञानिक कहते हैं कि नदियों के प्राकृतिक बहाव को रोकना-मोड़ना, अवैध-अधिक उत्‍खनन, गाद जमाव जैसी स्थितियों पर तत्‍काल प्रभाव से ध्‍यान देना होगा। विशेषज्ञों कहते हैं कि नदियों को बचाने के लिए सरकारी प्रयासों के साथ-साथ जनता की भागीदारी भी बहुत महत्वपूर्ण है। लोगों को नदियों के महत्व के बारे में जागरूक करना तथा उन्हें सफाई अभियानों से जोड़ना आवश्यक है। निश्चित रूप से समूची धरती पर जीने वाले जन-जन के मुख से निकलना चाहिए- नदियों को जीने दो, तभी नदियां हमें जीवन देंगी।

  • लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं

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