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दस दोषों को हरा मनाया जाए दशहरा!

दस दोषों को हरा मनाया जाए दशहरा!
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भूपेन्द्र शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार

सत्य की असत्य, अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक पर्व दशहरा प्रतिवर्ष जन-जीवन, धर्म-संस्कृति समाज, राष्ट्र पर भगवान श्रीराम के उपकार का आभास कराने के लिए मनाया जाता है।
पर्व का आध्यात्मिक भाव देखें, तो दशहरा दश एवं हरा शब्दों से बना है, जिनका अर्थ है दस को हरा। ये दस तत्त्व हैं- काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, आलस्य, भय, लापरवाही, घृणा एवं ईर्ष्या! ये दस अवगुण जिनमें हैं, वे ही असल में असत्य और बुराई का मौलिक रूप हैं, जो समाज, राष्ट्र तथा विश्व में कष्ट, कलह, हिंसा का कारण बनते रहे हैं तथा बन रहे हैं।
यहां हम पर्व के पारंपरिक आनंद, उल्लास की बात नहीं करेंगे बल्कि सत्य-असत्य, अच्छाई-बुराई के रूप में समाज में उपस्थित चरित्रों के क्रिया-कलाप, सोच-विचार पर मंथन करेंगे। यह विचाराभिव्यक्ति है- बुरे चरित्र तथा अच्छे चरित्र की!
रामचरितमानस में कहा है-
‘धर्म न दूसर सत्य समाना।’
यानी धरती पर सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं है।… किंतु सच यह है कि समाज से सत्य सिरे से गायब है। वर्तमान समय में जिसे यत्नपूर्वक खोजकर ही पाया जा सकता है।
भगवान श्रीराम सदाचार का प्रतीक हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। स्थितियां चाहे जैसी हों, वे अपनी मूल प्रकृति- परोपकार, सत्यता, पवित्रता कभी नहीं त्यागते। श्रीराम ने संपूर्ण विश्वभूमि को बुराई रहित कर अच्छाईयुक्त चरित्रों को सौंपा। इसी प्रकार सीताजी उस आत्मा का प्रतीक हैं, जो पांच तत्वों (क्षितिज, जल, अग्नि, आकाश, वायु) से निर्मित देह में वास करता है। जब आत्मा स्वयं का आभास करता है, तो वह जाग्रत और प्रबुद्ध हो जाता है तथा बाद में दुख, भय, सांसारिक लगाव एवं शारीरिक चेतना से उत्पन्न अन्य नकारात्मक भावनाओं से मुक्त हो जाता है। रावण बुराई का प्रतीक है, जिसकी मूल प्रकृति काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, आलस्य, भय, लापरवाही, घृणा एवं ईर्ष्या से परिपूर्ण है, जिसका फल उसे मिला।
लंबे अंतराल से प्रति वर्ष हम यह पर्व मनाते आ रहे हैं, किंतु दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज व्यक्ति इतना विचारहीन, सषुप्त है कि उसे यह आभास नहीं हो रहा कि जिस डाल पर बैठा है, उसी को काटने में लगा है। निस्संदेह आत्मसिंचित इस चरित्र (बुरे) को लोग धर्म-पंथ-जाति-वर्ग स्तर के सहारे विस्तार देने में जुटे हैं। बुरे चरित्र की तो बात ही क्या है, अच्छे चरित्र भी न अपना कर्म समझ रहे न धर्म समझ रहे।
गीता में लिखा है-
‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।’
कर्म पर व्यक्ति का अधिकार है, किंतु उसके फल पर नहीं। जैसा करोगे, वैसा परिणाम मिलेगा। … लेकिन समाज में यही वैचारिक जटिलता है कि व्यक्ति दूरद्रष्टता से काम नहीं ले रहा है। वह समझ नहीं रहा कि कर क्या रहा है और उसे करना क्या चाहिए। परिणामस्वरूप विजयादशमी पर्व पर जिस ‘बुराई पर अच्छाई’ की जीत का हर्ष-उल्लास हमारे द्वारा मनाया जाता है, आधुनिक समाज में वह बुराई व्यापकता से पसरी हुई है। चिंता की बात यह‌ है कि समाज में उपस्थित अच्छे चरित्र का भी बड़ा हिस्सा उन्ही बुराइयों से भरा है।
भगवान श्रीराम की बात त्रेता युग की है। उस काल में उन्होंने बुराई को मिटाकर चारों ओर रामराज्य (जियो और जीने दो की व्यवस्था) स्थापित किया। हमने श्रीराम के बताए मार्ग एवं आदर्शों से सीखा क्या? यह कभी प्रकट नहीं कर पाए, क्योंकि सीखा ही नहीं!
परिवर्तन प्रकृति का नियम है। युग बदला। द्वापर में फिर बुरे चरित्र ने तांडव मचाया। रामचरितमानस में लिखा है-
जब जब होहि धरम कै हानी।
बाढ़हि असुर अधम अभिमानी।।
तब तब प्रभु धरि विविध शरीरा।
हरहिं कृपा निधि सज्जन पीरा।।

द्वापर में श्री कृष्ण के रूप में भगवान का अवतरण कंस रूपी बुरे चरित्र का विनाश करने के लिए हुआ।
स्वाभाविक है श्रीराम-रावण एवं श्रीकृष्ण-कंस युद्ध कथा हमारे लिए अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक हैं। आठ लाख चौंसठ हजार वर्ष द्वापरयुग के बाद कलियुग आया।
कलियुग के संदर्भ में रामचरितमानस में कहा गया है-
‘कलि केवल मल मूल मलीना।
पाप पयोनिधि जन मन मीना।।’

कलियुग केवल पाप की जड़ और मलिन है, इसमें मनुष्यों का मन पापरूपी समुद्र में मछली बना हुआ है। यह बिल्कुल सच है।
यह कलयुग है। इसके पांच हजार एक सौ पच्चीस वर्ष बीते हैं। ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि पिछले 2574 वर्ष से बुरे चरित्र भारतभूमि के अच्छे चरित्र का विनाश करने के लिए लगातार प्रहार करते रहे हैं तथा किए जा रहे हैं। भारतभूमि में प्रवेश करनेवाला पहला चरित्र (बुरे) 550 ईपू आनेवाला ईरान के हखामनी वंश का आक्रांता सायरस था, जिसका लक्ष्य पूरा नहीं हो‌ सका। इसके बाद 518 ईपू फारस के राजा डेरियस प्रथम (जिसे दारा प्रथम भी कहते थे) से लेकर आज तक भारत के प्रति जन, धन, धर्म, संस्कृति के विरुद्ध विनाशकारी षड्यंत्र चले आए हैं।
हमें ध्यान यह रखना है कि भगवान श्रीराम या श्रीकृष्ण बुराई का‌ संहार करने नहीं आएंगे। हमें ही उनके बताए मार्ग एवं आदर्शों पर काम करना होगा। हमें आनन-फानन में अपने सोच-विचार बदलने होंगे।
सोचिए, आप पहले ही अपना बहुत कुछ खो चुके हैं, छोड़ चुके हैं। अब आपके पास जो है, उसे सुदृढ़, सुगठित रखना है। निश्चित रूप से इसके लिए, सर्वप्रथम हमें अपने अंदर स्थापित भ्रमित विचारों को बाहर करने एवं दोषों-दुर्गुणों पर विजय पाने की दिशा में काम करने का संकल्प लेना होगा। तभी समाज एवं राष्ट्र के लिए अपने आराध्यों के आदर्शों के अनुरूप एकजुटता के साथ कुछ कर सकेंगे।

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