सेवा के वटवृक्ष से कम होती छाया… स्वार्थ की धूप झुलसाने लगी
समझ सको तो समझो- बात है खरी अजय तिवारीएक नगर में एक पौधा सेवा का रोपा गया था। हर दिन के साथ वह बड़ा होता गया। वटवृक्ष बन जरूरतमंदों को छाया देकर दूर-दूर तक वैभव पाने लगा, जो उसकी छाया में आता सुकून पाता। परायो को अपना मानकर गले लगाने वालों का कारबां बढ़ता गया।…