1. हरिवंश राय बच्चन: “होली की पुकार”
बच्चन जी की कविताओं में मदिरा, मन और उल्लास का अद्भुत संगम मिलता है। उनकी यह रचना होली के हुड़दंग और भाईचारे का प्रतीक है।
“आज शब्द और अर्थ में हो रही है होरी,
भाव और भंगिमा में मच रही है झोरी!
मृदंग की थाप पर, चंग की थिरकन पर,
थिरक रहा आज सारा जग,
छोड़ लोक-लाज की चोरी!”
बच्चन जी कहते हैं कि होली केवल रंगों का त्यौहार नहीं, बल्कि मन के भेदों को मिटाने का अवसर है। इसमें ऊंच-नीच का भेद मिट जाता है और हर कोई एक ही रंग (मानवता) में रंग जाता है।
2. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’: “अबीर के बादल”
छायावाद के स्तंभ निराला जी ने होली के प्राकृतिक सौंदर्य और उल्लास को अपनी पंक्तियों में पिरोया है।
कविता अंश:
“खेलते हैं खेल, रंग भरे हाथ,
छिटक रही है चांदनी, भीग रही रात।
मलयज-पवन की मंद-मंद चाल,
गुलाल की आंधी, अबीर के गाल!”
निराला जी की कविताओं में होली एक उत्सव के साथ-साथ प्रकृति के यौवन का भी वर्णन करती है। बसंत की बयार और उड़ते गुलाल को उन्होंने ‘अबीर के बादल’ की उपमा दी है।
3. सुभद्रा कुमारी चौहान: “होली”
वीर रस और वात्सल्य की कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने होली को बड़ी ही सरलता और आत्मीयता से लिखा है।
कविता अंश:
“आओ प्रिय! हम तुम खेलें होली,
पिचकारी भर-भर मारें हम,
खोल हृदय की झोली।
बीत गई जो बातें,
उनको आज भुला दें हम,
प्रेम-रंग में डूब-डूबकर,
नया रूप सजा दें हम।”
उनकी कविता में क्षमा और प्रेम का संदेश प्रमुख है। वह कहती हैं कि पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाना ही सच्ची होली है।
4. मैथिलीशरण गुप्त: “पंचवटी में होली”
राष्ट्रकवि गुप्त जी ने अपनी रचनाओं में मर्यादा और परंपरा के साथ होली का वर्णन किया है।
कविता अंश:
“सब मिलकर मंगल गाओ,
आई होली ऋतुराज,
जन-जन के मन को भाया,
आज अनूठा साज़।
कोई मारे केसर-पानी,
कोई उड़ाए गुलाल,
भारत की इस पावन भूमि पर,
मची है आज धमाल।”
गुप्त जी की पंक्तियाँ भारतीय संस्कृति के गौरव और सामूहिक उत्सव की भावना को जागृत करती हैं।
5. भारतेंदु हरिश्चंद्र: “होली के पद”
आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह भारतेंदु जी ने ब्रज की होली और कृष्ण-राधा के प्रेम को बड़े ही मार्मिक ढंग से लिखा है।
कविता अंश:
“खेलत फाग सखी सब मिलि के,
श्याम संग ब्रज नारी, उ़ड़त गुलाल लाल भयो अंबर,
बरसत रंग की धारी।
छिन-छिन मारत पिचकारी,
भींजत सारी की सारी,
धन्य-धन्य यह ब्रज की होरी,
धन्य-धन्य गिरधारी।”
भारतेंदु जी की रचनाओं में ‘फाग’ (होली के गीत) की शास्त्रीय और लोक परंपरा की झलक मिलती है।
होली का आध्यात्मिक और सामाजिक रंग
- प्रेम का रंग: जैसा कि सूरदास और भारतेंदु की रचनाओं में कृष्ण-राधा के माध्यम से दिखता है।
- समानता का संदेश: निराला और बच्चन जी की कविताओं में जहाँ अमीर-गरीब का भेद मिट जाता है।
- प्रकृति का उत्सव: ऋतुराज बसंत के आगमन पर प्रकृति द्वारा खेली जाने वाली फूलों की होली।
होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य की वह विरासत है जिसने शब्दों को ‘गुलाल’ और भावनाओं को ‘केसरिया पानी’ बना दिया है। चाहे वह कबीर की ‘मन की होली’ हो या बच्चन की ‘मधुशाला वाली होली’, हर कवि ने समाज को प्रेम और सद्भाव का ही पाठ पढ़ाया है।
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