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    AAP में बड़ी फूट : राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल भाजपा में शामिल

    राघव चड्डा बागी हुए... खुद भाजपा में गए कई और को भी ले गए AI Image राघव चड्डा बागी हुए... खुद भाजपा में गए कई और को भी ले गए AI Image
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    नई दिल्ली
    BDC News | bhopalonline.org

    आम आदमी पार्टी (AAP) को अब तक का सबसे बड़ा झटका लगा है। पार्टी के प्रमुख चेहरे और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने ‘आप’ से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने का एलान कर दिया है। उनके साथ राज्यसभा सांसद संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने भी भाजपा का दामन थाम लिया है। चड्ढा ने दावा किया है कि वे राज्यसभा में ‘आप’ के दो-तिहाई सदस्यों के साथ भाजपा में विलय कर रहे हैं, जिससे उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होगा

    “गलत पार्टी में सही आदमी”: चड्ढा के तीखे प्रहार

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    प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राघव चड्ढा भावुक नजर आए। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने जीवन के 15 साल और खून-पसीना देकर इस पार्टी को सींचा था, लेकिन अब पार्टी अपने मूल सिद्धांतों और नैतिकता से भटक गई है। चड्ढा के अनुसार, पार्टी अब राष्ट्रहित के बजाय व्यक्तिगत लाभ के लिए काम कर रही है। उन्होंने खुद को “गलत पार्टी में सही आदमी” करार दिया।

    फूट की असली वजह: केजरीवाल से बढ़ती दूरियां

    राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह दरार तब गहरी हुई जब अरविंद केजरीवाल जेल में थे और राघव चड्ढा विदेश में थे। सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरों और चुनाव प्रचार से उनकी दूरी ने हाईकमान को नाराज कर दिया था। संदीप पाठक ने भी कहा कि उनका मकसद देश सेवा था, जो उन्हें अब ‘आप’ में संभव नहीं दिख रहा है।


    क्या यह ‘आप’ के अस्तित्व का संकट है?

    आम आदमी पार्टी के लिए यह घटनाक्रम महज एक राजनीतिक दलबदल नहीं, बल्कि एक वैचारिक और संगठनात्मक पराजय है। राघव चड्ढा और संदीप पाठक जैसे नेता पार्टी की रीढ़ माने जाते थे—एक रणनीति के माहिर थे तो दूसरे संगठन के। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से जन्मी पार्टी के भीतर जब उसके सबसे करीबी सिपाही “सिद्धांतों से भटकाव” का आरोप लगाते हैं, तो जनता के बीच पार्टी की साख कमजोर होती है। दो-तिहाई सांसदों के साथ विलय का दावा तकनीकी रूप से सदस्यता बचाने की कोशिश है। यदि स्वाति मालीवाल और हरभजन सिंह भी इस गुट में शामिल होते हैं, तो राज्यसभा में ‘आप’ का अस्तित्व लगभग समाप्त हो जाएगा। केजरीवाल के लिए अब चुनौती सिर्फ चुनाव जीतना नहीं, बल्कि अपनी बची-कुची टीम को एकजुट रखना है। क्या ‘आप’ इस झटके से उबर पाएगी या यह क्षेत्रीय राजनीति में उसके सिमटने की शुरुआत है? यह आने वाला वक्त तय करेगा।


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