11 साल में पहली बार सरकार को मिली मात
नई दिल्ली।
BDC News | bhopalonline.org
देश की राजनीति में आज एक ऐतिहासिक मोड़ देखने को मिला, जब महिला आरक्षण से संबंधित संविधान के तीन महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सके। सदन में पर्याप्त बहुमत न मिल पाने के कारण ये बिल गिर गए, जो मोदी सरकार के 11 साल के कार्यकाल में विधायी स्तर पर पहली बड़ी विफलता मानी जा रही है।

भारतीय संसदीय इतिहास में 17 अप्रैल, 2026 का दिन एक बड़े विधायी उलटफेर के रूप में दर्ज हो गया है। महिला आरक्षण को सुनिश्चित करने वाला ‘131वां संविधान संशोधन बिल’ तमाम बहसों और प्रयासों के बावजूद लोकसभा की दहलीज पार नहीं कर सका। सदन में दो-तिहाई बहुमत की अनिवार्य शर्त पूरी न होने के कारण यह बिल गिर गया, जो मोदी सरकार के 11 वर्षों के कार्यकाल में अपनी तरह की पहली विधायी हार मानी जा रही है।
मतदान का समीकरण: क्यों अटका विधेयक?
लोकसभा में इस बिल पर हुए मतदान के दौरान कुल 528 सांसदों ने हिस्सा लिया। चूंकि यह एक संविधान संशोधन बिल था, इसलिए इसे पारित करने के लिए विशेष बहुमत यानी सदन में मौजूद सदस्यों के दो-तिहाई (2/3) समर्थन की आवश्यकता थी।
- लक्ष्य: 528 सांसदों का दो-तिहाई आंकड़ा 352 वोट था।
- समर्थन: बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े।
- विरोध: विपक्ष ने लामबंद होकर इसके खिलाफ 230 वोट डाले।
- परिणाम: सरकार बहुमत के जादुई आंकड़े से 54 वोट पीछे रह गई और बिल गिर गया।
21 घंटे की मैराथन चर्चा और महिला सांसदों की गूंज
इस बिल पर सदन में गहन मंथन हुआ। लगातार 21 घंटों तक चली ऐतिहासिक चर्चा में पक्ष और विपक्ष के कुल 130 सांसदों ने अपनी बात रखी। इस चर्चा की सबसे खास बात यह रही कि इसमें 56 महिला सांसदों ने प्रखरता से अपने विचार साझा किए, जो महिला नेतृत्व के प्रति सदन की गंभीरता को दर्शाता है।
अमित शाह का कड़ा रुख: “विपक्ष है प्रगति का रोड़ा”
वोटिंग से पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने करीब एक घंटे तक सदन को संबोधित किया। उन्होंने इस बिल को महिलाओं के अधिकारों के लिए निर्णायक बताते हुए सीधा हमला विपक्ष पर बोला। शाह ने दो टूक शब्दों में कहा, “यदि यह बिल आज पारित नहीं होता है, तो इसकी संपूर्ण जिम्मेदारी केवल और केवल विपक्ष की होगी। देश की करोड़ों महिलाएं आज इस सदन की कार्यवाही देख रही हैं और वे भली-भांति समझ जाएंगी कि उनकी राजनीतिक प्रगति की राह में असली रोड़ा कौन खड़ा कर रहा है।”
11 साल में पहली विधायी विफलता
वर्ष 2014 से अब तक के सफर में यह पहला मौका है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार सदन में कोई सरकारी विधेयक पास कराने में विफल रही है। अब तक सरकार ने अनुच्छेद 370 और ट्रिपल तलाक जैसे कड़े कानूनों पर जीत हासिल की थी, लेकिन महिला आरक्षण के इस संवैधानिक संशोधन पर संख्या बल का गणित विपक्ष के पक्ष में झुक गया।
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