बाबा साहेब और वर्तमान राजनीति
अजय तिवारी
BDC News | bhopalonline.org
भारतीय संविधान के शिल्पकार, प्रखर अर्थशास्त्री और समाज सुधारक डॉ. भीमराव अंबेडकर की आज 14 अप्रैल 2026 को 135वीं जयंती मनाई जा रही है। एक ऐसे समय में जब देश चुनावी सुगबुगाहटों और वैचारिक ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रहा है, बाबा साहेब का नाम भारतीय राजनीति के केंद्र में है। आज कोई भी राजनीतिक दल, चाहे वह दक्षिणपंथी हो, वामपंथी हो या क्षेत्रीय, अंबेडकर के नाम का सहारा लिए बिना अपनी चुनावी नैया पार लगाने की कल्पना नहीं कर सकता। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या राजनीति वास्तव में अंबेडकर के उन सिद्धांतों को अपना रही है, या केवल उनके ‘वोट बैंक’ और ‘प्रतीकों’ का इस्तेमाल कर रही है? मौलिक अधिकार क्या हैं? जानिए मौलिक अधिकारों की सूची, उनके प्रकार और महत्व।
प्रतीकों की राजनीति और ‘कन्वर्जन’ की होड़
पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया है। पहले अंबेडकर को केवल दलित केंद्रित राजनीति का हिस्सा माना जाता था, लेकिन आज भाजपा, कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच उन्हें अपना बताने की होड़ लगी है। भारतीय जनता पार्टी ने पिछले वर्षों में बाबा साहेब को ‘पंचतीर्थ’ के माध्यम से एक राष्ट्रीय नायक के रूप में स्थापित करने में भारी निवेश किया है। महू से लेकर लंदन तक उनके स्मारकों का निर्माण इस बात का प्रमाण है। भाजपा की रणनीति उन्हें ‘हिंदू समाज के भीतर सुधारक’ के रूप में दिखाने की रही है, ताकि दलित मतों को हिंदुत्व के व्यापक दायरे में लाया जा सके। वहीं, कांग्रेस अब आक्रामक रूप से यह प्रचारित कर रही है कि बाबा साहेब के संविधान को वर्तमान सरकार से खतरा है। कांग्रेस उन्हें लोकतंत्र और उदारवाद के रक्षक के रूप में पेश कर रही है ताकि वह अपने पुराने आधार को वापस पा सके।
वोट बैंक की राजनीति का ‘अंबेडकर कार्ड’
सियासी इस्तेमाल का सबसे बड़ा पहलू ‘अंकगणित’ है। भारत की कुल जनसंख्या में दलित आबादी लगभग 17-20% है, जो कई राज्यों में हार-जीत तय करती है। चुनावों के दौरान अक्सर यह नैरेटिव गढ़ा जाता है कि अमुक पार्टी सत्ता में आई तो आरक्षण खत्म कर देगी या संविधान बदल देगी। यह बाबा साहेब के नाम का सबसे बड़ा सियासी डर है, जिसका इस्तेमाल मतदाता को एकजुट करने के लिए किया जाता है। सरकारें अक्सर बाबा साहेब के नाम पर कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा करती हैं। हालांकि ये योजनाएं स्वागत योग्य हैं, लेकिन इनकी टाइमिंग अक्सर चुनावों के आस-पास होती है, जो इनके पीछे के ‘सियासी इरादे’ को स्पष्ट करती है।
विचारधारा का सरलीकरण और विरूपण
राजनीतिक दल अंबेडकर के विचारों को अपनी सुविधा के अनुसार ‘फिल्टर’ करते हैं। उनके सामाजिक न्याय को केवल वर्ग संघर्ष के चश्मे से देखते हैं। बाबा साहेब एक प्रखर अर्थशास्त्री थे। उन्होंने ‘रुपये की समस्या’ और कृषि सुधारों पर जो लिखा, उस पर आज शायद ही कोई दल गंभीर चर्चा करता हो। राजनीति केवल उन्हें ‘दलितों के मसीहा’ तक सीमित कर देना चाहती है, जबकि वे एक ‘ग्लोबल थिंकटैंक’ थे।
संवैधानिक मूल्यों का क्षरण और सियासी ढोंग
आज के दौर में हर नेता मंच पर खड़े होकर संविधान की प्रति को चूमता है और बाबा साहेब के आगे नतमस्तक होता है। लेकिन सदन के भीतर और बाहर संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा का जिस तरह हनन होता है, वह बाबा साहेब के प्रति सच्ची श्रद्धा पर सवाल उठाता है। अंबेडकर ने ‘संवैधानिक नैतिकता’ (Constitutional Morality) की बात की थी। आज की राजनीति में नैतिकता के बजाय ‘सत्ता की भूख’ सर्वोपरि है। दलबदल, हेट स्पीच और लोकतांत्रिक संस्थाओं का दबाव इस बात का संकेत है कि हम बाबा साहेब के नाम का इस्तेमाल तो कर रहे हैं, पर उनके मूल्यों की हत्या कर रहे हैं।
सोशल मीडिया और प्रोपेगेंडा का दौर
2026 की डिजिटल दुनिया में बाबा साहेब के उद्धरणों का इस्तेमाल एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए किया जाता है। फोटोशॉप्ड इमेजेस और आधे-अधूरे संदर्भों के साथ उनके बयानों को वायरल करना आज की आईटी सेल की दिनचर्या है। यह वैचारिक विमर्श को खत्म कर केवल एक छवि बनाने का खेल है।
क्या केवल उत्सव काफी है?
आज देश्भर में अंबेडकर जयंती पर आयोजन हो रहे हैं। सड़कों पर नीले झंडे हैं और हवा में ‘जय भीम’ के नारे हैं। लेकिन क्या हम उस समाज की ओर बढ़ रहे हैं जिसका सपना बाबा साहेब ने देखा था? आज की राजनीति में जातिगत जनगणना की मांग बाबा साहेब के सामाजिक न्याय के नाम पर ही की जा रही है। लेकिन क्या यह जातियों को मिटाने के लिए है या जातियों को और अधिक राजनीतिक रूप से संगठित करने के लिए? बाबा साहेब तो ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ (जाति का विनाश) चाहते थे।
अंत में.. डॉ. अंबेडकर का सियासी इस्तेमाल इस बात का प्रमाण है कि वे आज भी प्रासंगिक हैं और उनके बिना भारत की राजनीति अधूरी है। लेकिन राजनीति को यह समझना होगा कि बाबा साहेब केवल ‘वोट’ खींचने का यंत्र नहीं हैं। वे एक विचार हैं, एक मार्ग हैं। अगर वास्तव में हम उन्हें श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो राजनीति को प्रतीकों से हटकर नीतियों पर आना होगा। उनके नाम पर लड़ने के बजाय, उनके संविधान की मूल भावना—स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—को सुरक्षित रखना ही उनकी जयंती की सार्थकता होगी। अन्यथा, 14 अप्रैल का दिन महज एक रस्म बनकर रह जाएगा, जिसमें नेता अपनी सियासी रोटियां सेंकेंगे और समाज का वंचित तबका आज भी अपने वास्तविक हक की प्रतीक्षा करता रहेगा।
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