जबलपुर|BDC News|bhopalonline.org
मध्य प्रदेश में लंबे समय से लंबित 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण विवाद पर हाईकोर्ट ने अपना रुख कड़ा कर लिया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए माननीय हाईकोर्ट ने संबंधित पक्षों को आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए 15 अप्रैल 2026 की अंतिम समय सीमा (डेडलाइन) निर्धारित कर दी है। इस मामले की अगली अहम सुनवाई 2 अप्रैल को होनी तय हुई है।
चीफ जस्टिस की युगलपीठ ने जारी किए निर्देश
इस संवेदनशील मामले की सुनवाई हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ द्वारा की जा रही है। सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरक्षण से जुड़े सभी दावों और आपत्तियों के दस्तावेजी साक्ष्य समय सीमा के भीतर पेश किए जाएं, ताकि मामले के निराकरण की दिशा में तेजी से बढ़ा जा सके।
क्या है पूरा विवाद? (पक्ष और विपक्ष के तर्क)
मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किए जाने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
- विरोध का आधार: याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के ‘इंदिरा साहनी’ और ‘मराठा आरक्षण’ मामलों का हवाला देते हुए तर्क दिया है कि किसी भी स्थिति में कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए।
- 87:13 फॉर्मूले पर आपत्ति: कई याचिकाओं में राज्य सरकार के 87:13 के फॉर्मूले को भी चुनौती दी गई है। इसमें 13 प्रतिशत पदों को ‘होल्ड’ पर रखने के निर्णय को असंवैधानिक बताया गया है।
- पक्ष का तर्क: वहीं, आरक्षण के समर्थन में दायर याचिकाओं में दलील दी गई है कि प्रदेश की आबादी के अनुपात में ओबीसी वर्ग को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, जो कि संवैधानिक रूप से न्यायसंगत है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और समय सीमा का दबाव
उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण से संबंधित विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) को वापस मध्य प्रदेश हाईकोर्ट भेजते हुए विशेष बेंच गठित करने के निर्देश दिए थे। शीर्ष अदालत ने इस पूरे विवाद का निपटारा तीन माह के भीतर करने का लक्ष्य रखा था।
चिंता का विषय: कोर्ट के निर्धारित समय में से दो माह का समय बीत चुका है, लेकिन अब तक अंतिम फैसला नहीं हो सका है। इसी कारण हाईकोर्ट अब सुनवाई की प्रक्रिया में तेजी ला रहा है।
वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने रखी अपनी बात
सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान विभिन्न पक्षों की ओर से दिग्गज वकीलों ने पैरवी की:
- आरक्षण के विरोध में वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी ने दलीलें पेश कीं।
- मध्य प्रदेश सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह उपस्थित रहे।
- हस्तक्षेपकर्ताओं की तरफ से अधिवक्ता वरुण ठाकुर ने पक्ष रखा।
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