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विश्लेषण : मध्य पूर्व में महाजंग की आहट और कूटनीतिक हार

इस्लामाबाद वार्ता विफल.. आगे की राह कठिन. AI इस्लामाबाद वार्ता विफल.. आगे की राह कठिन. AI

अजय तिवारी
BDC News | bhopalonlie.org

इस्लामाबाद के जिन्ना कन्वेंशन सेंटर में पिछले इक्कीस घंटों से चल रही अमेरिका और ईरान के बीच की महा-वार्ता का बिना किसी नतीजे के समाप्त हो जाना केवल एक कूटनीतिक असफलता नहीं है, बल्कि यह इक्कीसवीं सदी के सबसे जटिल वैश्विक संकट की उस भयावहता का परिचायक है जो अब पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लेने के लिए तैयार खड़ी है। इस वार्ता से पूरी दुनिया को उम्मीद थी कि शायद दशकों से चली आ रही दुश्मनी का कोई सिरा हाथ लगेगा और मध्य पूर्व में शांति की नई किरण दिखाई देगी, लेकिन अंततः जो हाथ लगा वह है गहरा सस्पेंस, कड़ा गतिरोध और भविष्य की एक अनिश्चित भयावहता। यह वार्ता उस मोड़ पर विफल हुई है जहां दुनिया एक नई महाजंग की दहलीज पर खड़ी है और पाकिस्तान की राजधानी में हुई इस कोशिश का नाकाम होना यह दर्शाता है कि कूटनीति की मेज अब शायद बारूद की गंध के सामने छोटी पड़ने लगी है। इक्कीस घंटों तक चली इस मैराथन बैठक के दौरान माहौल में जो गर्माहट रही, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी हो चुकी है जिसे अब शब्दों के पुल से पाट पाना लगभग असंभव है। इस विफलता की जड़ों में झांकने पर पता चलता है कि यह केवल दो देशों का टकराव नहीं था, बल्कि यह दो विचारधाराओं, दो प्रभुत्व की लड़ाई और दो ऐसी शर्तों का टकराव था जिनमें से कोई भी पक्ष झुकने को तैयार नहीं था।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य की चाबी पर नियंत्रण का सवाल इस वार्ता के केंद्र में था और ईरान ने इस पर जो कड़ा रुख अपनाया, उसने अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या ईरान वास्तव में शांति चाहता है या वह अपनी सामरिक शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है। हॉर्मुज केवल एक समुद्री मार्ग नहीं है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की जीवनरेखा है और ईरान का इस पर पूर्ण नियंत्रण का दावा करना अमेरिका के लिए सीधे तौर पर विश्व व्यापार को चुनौती देने जैसा था। जेडी वेंस ने जिस दो टूक अंदाज में ईरान के इस दावे को खारिज किया, उसने यह साफ कर दिया कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक रास्तों पर किसी भी तरह की मनमानी बर्दाश्त नहीं करेगा, भले ही इसके लिए उसे सैन्य विकल्प का ही सहारा क्यों न लेना पड़े। ईरान के लिए हॉर्मुज उसकी संप्रभुता और सुरक्षा का कवच है, जिसे वह किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं है, और यही वह बिंदु था जिसने वार्ता की मेज पर मौजूद बाकी तमाम समझौतों को धूल में मिला दिया। जलडमरूमध्य के इस विवाद ने वार्ता के पहले ही दौर में यह संकेत दे दिए थे कि समझौते की गुंजाइश बहुत कम है क्योंकि दोनों ही देश अपनी सामरिक स्थिति से रत्ती भर भी समझौता करने को तैयार नहीं थे।

वार्ता की विफलता का दूसरा सबसे बड़ा कारण लेबनान और हिजबुल्लाह का मुद्दा रहा जिसने बातचीत की दिशा को पूरी तरह से मोड़ दिया। ईरान चाहता था कि लेबनान में तुरंत सीजफायर लागू हो और वहां हो रही सैन्य कार्रवाइयों पर विराम लगे, लेकिन अमेरिका की शर्त इससे कहीं अधिक कड़ी और स्पष्ट थी। अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया कि बिना हिजबुल्लाह को निहत्था करने के किसी ठोस रोडमैप के वह किसी भी तरह के सीजफायर पर राजी नहीं होगा। ईरान के लिए हिजबुल्लाह उसका सबसे बड़ा और भरोसेमंद सहयोगी है और उसे निहत्था करने का मतलब था क्षेत्र में अपनी धमक को पूरी तरह से समाप्त कर देना। इस विरोधाभास ने मेज पर मौजूद वार्ताकारों के बीच इतनी तल्खी पैदा कर दी कि कई बार बैठक टूटने के कगार पर पहुंच गई। लेबनान का संकट केवल एक देश का संकट नहीं है, बल्कि यह पूरे मध्य पूर्व की राजनीति का केंद्र बिंदु बन चुका है और जब तक अमेरिका और ईरान इस पर किसी एक सहमति पर नहीं पहुंचते, तब तक क्षेत्र में शांति की कोई भी कोशिश केवल कागजी बनकर रह जाएगी।

अमेरिका की मांगें भी ईरान के लिए पूरी तरह से अस्वीकार्य थीं, विशेषकर परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से फ्रीज करने की जिद। अमेरिका चाहता था कि ईरान अपने सभी परमाणु ठिकानों को बंद करे और अंतरराष्ट्रीय निगरानी में आए, लेकिन ईरान ने बदले में अपनी उन अरबों डॉलर की संपत्तियों को मुक्त करने की मांग रखी जो दशकों से अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण फ्रीज हैं। ईरान की सुरक्षा गारंटी की मांग ने अमेरिका को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया, क्योंकि अमेरिका के लिए ऐसी किसी भी गारंटी का मतलब था क्षेत्र में इजराइल और अपने अन्य सहयोगियों की सुरक्षा के साथ समझौता करना। संपत्तियों की मुक्ति और परमाणु कार्यक्रम का यह पेचीदा मुद्दा वार्ता की विफलता की ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ। अब जबकि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल वाशिंगटन लौट रहा है और ईरानी दल तेहरान जा रहा है, तो यह स्पष्ट है कि अगली रिपोर्टें शांति की नहीं बल्कि नई तैयारियों की होंगी।

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डोनाल्ड ट्रम्प और ईरान के सर्वोच्च नेता के पास अब जो रिपोर्ट पहुंचेगी, उसमें समझौते की गुंजाइश कम और संघर्ष की आशंका अधिक होगी। इस वार्ता को आधिकारिक तौर पर ‘स्थगित’ कहा गया है, लेकिन कूटनीति की भाषा में स्थगन अक्सर विफलता का ही दूसरा नाम होता है जब तक कि कोई चमत्कार न हो जाए। लेबनान में बढ़ता तनाव और हॉर्मुज की गर्माहट इस बात की ओर इशारा कर रही है कि आने वाले दिन और भी अधिक चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं। वैश्विक बाजार और आम जनता इस वार्ता की विफलता से सहमी हुई है क्योंकि इसका सीधा असर तेल की कीमतों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। जब कूटनीति विफल होती है, तो बंदूकें बोलने लगती हैं और इस्लामाबाद वार्ता का यह नतीजा इसी आशंका को बल देता है कि अब शायद दुनिया को एक और युद्ध के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना होगा। यह विफलता इस बात का प्रमाण है कि शक्ति संतुलन की लड़ाई अब समझौतों से ऊपर जा चुकी है और विश्व शांति की उम्मीदें अब केवल इतिहास के पन्नों में ही सुरक्षित रह गई हैं।

अंततः, यह समझना महत्वपूर्ण है कि इस्लामाबाद में हुआ यह गतिरोध केवल अमेरिका और ईरान की आपसी समस्या नहीं है, बल्कि यह उस वैश्विक नेतृत्व की कमी को दर्शाता है जो आज की दुनिया को शांति की दिशा में ले जाने में विफल हो रहा है। अगर इक्कीस घंटे की निरंतर चर्चा के बाद भी दुनिया के दो सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी एक सामान्य समझौते तक नहीं पहुंच सके, तो यह वैश्विक कूटनीति की सबसे बड़ी हार है। अब जबकि दोनों देश अपनी-अपनी राजधानियों में रिपोर्ट सौंपेंगे, तो वहां से शांति का संदेश आने की संभावना बहुत कम है। लेबनान की पहाड़ियों से लेकर हॉर्मुज के नीले पानी तक, अब केवल बारूद की महक और अनिश्चितता का बादल ही मंडराता रहेगा, क्योंकि इस्लामाबाद की यह मेज अब सूनी हो चुकी है और उम्मीदें भी।




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