फीचर डेस्क.
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“पृथ्वी हमारे पूर्वजों से मिली हुई विरासत नहीं, बल्कि हमारे बच्चों से लिया हुआ उधार है।” यह प्राचीन कहावत आज के दौर में जितनी सटीक बैठती है, उतनी पहले कभी नहीं थी। हर साल 22 अप्रैल को दुनिया भर में ‘पृथ्वी दिवस’ (Earth Day) मनाया जाता है। यह केवल एक कैलेंडर की तिथि नहीं है, बल्कि यह उस गंभीर चेतावनी का स्मरण दिवस है, जिसे हम विकास की अंधी दौड़ में अक्सर अनसुना कर देते हैं। अरबों किलोमीटर फैले अंतरिक्ष में पृथ्वी ही वह एकमात्र स्थान है जहाँ जीवन का अंकुर फूटता है, जहाँ नदियाँ कलकल करती हैं और जहाँ ऑक्सीजन का संचार होता है। लेकिन आज वही पृथ्वी अपने ही सबसे समझदार कहे जाने वाले जीव यानी मनुष्य की गतिविधियों के कारण ‘अस्तित्व के संकट’ से जूझ रही है।
पृथ्वी दिवस का इतिहास: एक जन-आंदोलन की शुरुआत
पृथ्वी दिवस मनाने की शुरुआत 1970 में हुई थी। 1969 में अमेरिका के सांता बारबरा में हुए भयानक तेल रिसाव (Oil Spill) ने पर्यावरण को जो नुकसान पहुँचाया, उसने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। अमेरिकी सीनेटर गेलॉर्ड नेल्सन ने पर्यावरण संरक्षण को राष्ट्रीय एजेंडे में लाने के लिए एक मुहिम शुरू की। 22 अप्रैल 1970 को पहली बार अमेरिका के सड़कों पर लगभग 2 करोड़ लोग (तत्कालीन आबादी का 10%) पर्यावरण विनाश के विरोध में उतरे। यह आधुनिक पर्यावरण आंदोलन की सबसे बड़ी शुरुआत थी। इसी के परिणामस्वरूप अमेरिका में ‘एनवायर्नमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी’ (EPA) का गठन हुआ और स्वच्छ हवा व पानी से जुड़े कड़े कानून बने। 1990 तक आते-आते यह दिवस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाने लगा और आज 190 से अधिक देश इसमें शामिल हैं।
वर्तमान परिदृश्य: जलती हुई पृथ्वी और पिघलते ग्लेशियर
आज जब हम 21वीं सदी के तीसरे दशक में खड़े हैं, तो पृथ्वी की स्थिति और भी भयावह हो गई है। ग्लोबल वार्मिंग अब केवल वैज्ञानिक शोधों का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह हमारे दरवाजे पर खड़ी सच्चाई है। पिछले एक दशक को मानव इतिहास का सबसे गर्म दशक दर्ज किया गया है। पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। यदि यह वृद्धि औद्योगिक क्रांति के स्तर से 1.5°C से अधिक हो जाती है, तो पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) में ऐसे बदलाव आएंगे जिन्हें वापस ठीक करना असंभव होगा। हिमालय से लेकर अंटार्कटिका तक, बर्फ की विशाल चादरें पिघल रही हैं। इससे न केवल समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, बल्कि आने वाले समय में दुनिया भर की नदियों के सूखने का खतरा भी पैदा हो गया है। हर साल हजारों प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं। जंगलों की कटाई और बढ़ते प्रदूषण ने वन्यजीवों के आवास छीन लिए हैं। हम एक ऐसे ‘छठे सामूहिक विनाश’ (Sixth Mass Extinction) की ओर बढ़ रहे हैं, जिसका कारण प्रकृति नहीं, बल्कि स्वयं मानव है।
प्रदूषण का दानव: प्लास्टिक और जहरीली हवा
पृथ्वी के फेफड़े कहे जाने वाले जंगल (जैसे अमेज़न के वर्षावन) लगातार कम हो रहे हैं। दूसरी ओर, प्लास्टिक प्रदूषण ने हमारे महासागरों को ‘प्लास्टिक का सूप’ बना दिया है। हर साल लाखों टन प्लास्टिक कचरा समुद्र में फेंका जाता है, जो समुद्री जीवों के माध्यम से अंततः हमारी ‘फूड चेन’ (खाद्य श्रृंखला) में प्रवेश कर रहा है। हवा की गुणवत्ता इतनी खराब हो चुकी है कि दुनिया के अधिकांश महानगरों में सांस लेना ‘धीमे जहर’ के सेवन जैसा है। औद्योगिक उत्सर्जन और वाहनों से निकलने वाला धुआं ओजोन परत को नुकसान पहुँचा रहा है और श्वसन संबंधी बीमारियों का कारण बन रहा है।
क्या केवल एक दिन काफी है?
पृथ्वी दिवस मनाना तब तक सार्थक नहीं है जब तक हम अपनी जीवनशैली में स्थायी बदलाव न लाएं। हमें ‘उपयोग करो और फेंको’ (Use and Throw) वाली संस्कृति को त्यागना होगा। इसके लिए कुछ बुनियादी कदम उठाए जा सकते हैं। जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम) पर निर्भरता कम करके सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जल-विद्युत की ओर बढ़ना होगा। घर और दफ्तरों में बिजली की बचत एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम है। पेड़ केवल लकड़ी नहीं देते, वे पृथ्वी की ढाल हैं। हमें केवल पौधे लगाने नहीं, बल्कि उन्हें पाल-पोसकर बड़ा करने का संकल्प लेना चाहिए। ‘अगला विश्व युद्ध पानी के लिए होगा’—यह चेतावनी हमें जल की हर बूंद की कीमत समझने पर मजबूर करती है। वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को अनिवार्य बनाना समय की मांग है। ‘एकल उपयोग प्लास्टिक’ (Single-use Plastic) का पूर्ण बहिष्कार करें। जूट या कपड़े के थैलों का उपयोग एक बड़ी क्रांति ला सकता है।
अर्थव्यवस्था बनाम पर्यावरण: एक संतुलित मार्ग
अक्सर तर्क दिया जाता है कि पर्यावरण संरक्षण से विकास की गति धीमी हो जाएगी। लेकिन सच यह है कि यदि पृथ्वी ही नहीं रहेगी, तो अर्थव्यवस्था का क्या होगा? ‘सतत विकास’ (Sustainable Development) ही वह एकमात्र मार्ग है जिससे हम अपनी वर्तमान जरूरतों को पूरा कर सकते हैं और भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी संसाधन बचा सकते हैं। ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ (Circular Economy) जहाँ कचरे को कम से कम किया जाए और पुनर्चक्रण (Recycling) को बढ़ावा दिया जाए, आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
पृथ्वी गृह के मालिक है हम
पृथ्वी दिवस हमें याद दिलाता है कि हम इस ग्रह के मालिक नहीं, बल्कि इसके संरक्षक (Custodians) हैं। मिट्टी, हवा और पानी हमारे जीवन का आधार हैं। यदि हम मिट्टी को जहरीला करेंगे, तो हमें जहरीला अनाज मिलेगा। यदि हम हवा को प्रदूषित करेंगे, तो हमें बीमारियां मिलेंगी।
2026 में, जब दुनिया तकनीक के चरम पर है, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी तकनीक हमें एक नई पृथ्वी नहीं दे सकती। मंगल या चंद्रमा पर जीवन की खोज रोमांचक हो सकती है, लेकिन पृथ्वी ही हमारा एकमात्र घर है। इस पृथ्वी दिवस पर आइए हम केवल भाषण न दें, बल्कि एक संकल्प लें—एक पेड़ लगाने का, पानी बचाने का या प्लास्टिक छोड़ने का। पृथ्वी की रक्षा करना किसी एक देश या संस्था की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि इस धरा पर रहने वाले हर मनुष्य का धर्म है।
हमारी पृथ्वी, हमारा भविष्य। इसे बचाएं, तभी हम बचेंगे।