ग्वालियर। डिजिटल डेस्क
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मध्य प्रदेश में अवैध खनन और खनिज विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने राज्य सरकार के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने सरकार से तीखे सवाल करते हुए पूछा है कि जिन खनन संचालकों पर करोड़ों रुपये का जुर्माना बकाया है, उनसे अब तक वसूली क्यों नहीं की गई? इसके साथ ही कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई है कि ऐसे डिफाल्टरों को दोबारा खनन लीज किस आधार पर आवंटित कर दी गई।
हाई कोर्ट की युगलपीठ ने जताई कड़ी नाराजगी
ग्वालियर स्थित हाई कोर्ट की युगलपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया और न्यायमूर्ति पुष्पेंद्र यादव शामिल हैं, ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के ढुलमुल रवैये पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। यह जनहित याचिका याचिकाकर्ता अकरम खान की ओर से दायर की गई है, जिसमें खनिज विभाग की लापरवाही और नियमों की अनदेखी को उजागर किया गया है।
वर्ष 2017 से बकाया है ₹305.97 करोड़ का जुर्माना
दायर याचिका में यह चौंकाने वाला खुलासा किया गया है कि ग्वालियर जिले के कई खनन संचालकों पर वर्ष 2017 से कुल 305 करोड़ 97 लाख रुपये का जुर्माना बकाया है। नियमानुसार, तय समय सीमा के भीतर जुर्माना जमा न करने वाले संचालकों को ब्लैकलिस्ट (काली सूची में डालना) किया जाना चाहिए था और उनकी तमाम खनन गतिविधियों पर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए थी। इसके बावजूद संबंधित विभाग ने इनके खिलाफ कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया।
नियमों को ताक पर रखकर नई लीज और नवीनीकरण
याचिका में खनिज विभाग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा गया है कि भारी-भरकम राशि बकाया होने के बावजूद संबंधित खदान संचालकों की पुरानी लीज का न केवल नवीनीकरण (Renewal) कर दिया गया, बल्कि उन्हें नई खनन लीज भी आवंटित कर दी गईं। इसी बिंदु पर संज्ञान लेते हुए हाई कोर्ट ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है कि नियमों को ताक पर रखकर ऐसे डिफाल्टरों को दोबारा खनन की अनुमति कैसे और क्यों दी गई?
जांच के दायरे में आ सकते हैं जिम्मेदार अधिकारी
मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने सख्त लहजे में संकेत दिए हैं कि यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो इस पूरे खेल में शामिल जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जाएगी। हाई कोर्ट की इस सख्ती के बाद अब राज्य सरकार को इस मामले में कोर्ट के समक्ष अपना विस्तृत और संतोषजनक पक्ष रखना होगा।
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