इंसानियत की मिसाल: जब तकनीकी कुशलता के साथ जुड़ी संवेदनशीलता
भोपाल।
BDC News | bhopalonline.org
चिकित्सा केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक साधना है। इस बात को एक बार फिर चरितार्थ किया है भोपाल के सेवा सदन आई हॉस्पिटल ने। यहाँ डॉक्टरों की टीम ने न केवल एक जटिल ऑपरेशन को अंजाम दिया, बल्कि एक गरीब परिवार की उम्मीदों को टूटने से बचाकर इंसानियत की एक नई इबारत लिखी है।
जब भारी भरकम खर्च और बेरुखी ने तोड़ी उम्मीदें
कुरावर के रहने वाले अंकित और पूजा सेन के लिए उनकी दो महीने की बेटी महक की आँखों में आई सफेदी किसी गहरे सदमे से कम नहीं थी। मजदूरी कर परिवार चलाने वाले इस दंपत्ति ने भोपाल के कई निजी अस्पतालों के दरवाजे खटखटाए। कहीं 60,000 रुपये का खर्च बताकर उन्हें डरा दिया गया, तो कहीं डॉक्टरों के व्यवहार में संवेदनशीलता का अभाव दिखा। एक मासूम की आँखों के सामने अंधेरा गहरा रहा था और माता-पिता की जेब खाली थी।
सेवा सदन: जहाँ इलाज से पहले मिलती है सहानुभूति
थक-हारकर जब यह परिवार सेवा सदन आई हॉस्पिटल पहुँचा, तो यहाँ का माहौल उनके लिए किसी मरहम जैसा था। यहाँ के डॉक्टरों ने उन्हें यह अहसास कराया कि इलाज केवल पैसों से नहीं, बल्कि सेवा भाव से भी किया जाता है। सीनियर पीडियाट्रिक ऑप्थल्मोलॉजिस्ट डॉ. रश्मि आप्टे ने महक की जाँच की और उसे गंभीर मोतियाबिंद से ग्रसित पाया।
मासूम की आँखों में रोशनी का वो पल
डॉक्टरों की टीम ने एडवांस तकनीक और पूरी संवेदनशीलता के साथ महज एक सप्ताह के भीतर महक की दोनों आँखों की सफल सर्जरी की। जब ऑपरेशन के बाद महक की आँखों से पट्टी खुली और उसने पहली बार अपनी माँ का चेहरा देखा, तो अस्पताल का वातावरण भावुक हो उठा। पिता अंकित सेन ने रुंधे गले से कहा, “यहाँ हमें सिर्फ इलाज ही नहीं मिला, बल्कि अपनापन और इंसानियत भी मिली। हमारी बेटी अब देख सकती है, यह हमारे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है।”
जागरूकता का संदेश
महक की यह कहानी न केवल एक अस्पताल की सफलता है, बल्कि उन सभी अभिभावकों के लिए एक संदेश भी है कि बच्चों की आँखों में किसी भी बदलाव को नजरअंदाज न करें। सेवा सदन आई हॉस्पिटल ने यह साबित कर दिया कि यदि चिकित्सा में सेवा का भाव और मानवता का संगम हो, तो कोई भी बाधा दूर की जा सकती है।
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