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जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा: मोदी सरकार के मंत्री पद से क्यों हटे जॉर्ज कुरियन?

जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा: मोदी सरकार के मंत्री पद से क्यों हटे जॉर्ज कुरियन?
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नई दिल्ली। डिजिटल डेस्क
BDC News | bhopalonline.org

मोदी सरकार के मंत्रिमंडल में बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जहाँ अल्पसंख्यक मामलों और मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. मंगलवार को उनके द्वारा सौंपे गए इस इस्तीफे को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर लिया है. 65 वर्षीय जॉर्ज कुरियन अगस्त 2024 से मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में राज्य मंत्री के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे थे. उनके इस इस्तीफे के बाद अब राजनीतिक गलियारों में केंद्रीय मंत्रिमंडल में संभावित फेरबदल की चर्चाएं तेज हो गई हैं.

कौन हैं जॉर्ज कुरियन? एक संक्षिप्त परिचय

जॉर्ज कुरियन भारतीय जनता पार्टी (BJP) के एक अत्यंत अनुभवी और कद्दावर नेता माने जाते हैं. उनका जन्म 20 सितंबर 1960 को केरल के कोट्टायम जिले के एट्टुमानूर में हुआ था. शैक्षणिक रूप से वे एक कानून विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने लॉ में ग्रेजुएशन और पोस्ट-ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की है. राजनीति के अलावा, उन्होंने भारत के सुप्रीम कोर्ट में एक वकील के तौर पर भी अपनी प्रैक्टिस की है. कुरियन का भाजपा से नाता काफी पुराना है; वे 1980 में पार्टी की स्थापना के समय से ही इसके सदस्य रहे हैं.

मंत्री के तौर पर उनका सफर

जॉर्ज कुरियन ने 9 जून 2024 को केंद्रीय राज्य मंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की थी. इसके बाद 11 जून 2024 को उन्होंने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय और मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय का कार्यभार संभाला था. वे एक कुशल प्रशासक रहे हैं और केंद्र में आने से पहले उन्होंने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई है. इसके अतिरिक्त, वे तत्कालीन रेल राज्य मंत्री ओ. राजगोपाल के विशेष कर्तव्य अधिकारी (OSD) के रूप में भी कार्य कर चुके हैं, जिससे उन्हें शासन और प्रशासन का गहरा अनुभव प्राप्त हुआ.

इस्तीफे के पीछे की असली वजह

जॉर्ज कुरियन के इस्तीफे के पीछे मुख्य रूप से उनका राज्यसभा कार्यकाल का समाप्त होना है. चूंकि उनका राज्यसभा कार्यकाल पूरा हो चुका था और पार्टी ने उन्हें उच्च सदन में दोबारा नामांकित न करने का निर्णय लिया था, इसलिए संवैधानिक बाध्यता के कारण उन्हें केंद्रीय मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केरल विधानसभा चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन और पार्टी की नई रणनीतियों के चलते यह फैसला लिया गया है. सूत्रों के अनुसार, अब केंद्रीय नेतृत्व उन्हें राष्ट्रीय राजनीति से हटाकर केरल की सक्रिय राज्य राजनीति में वापस भेजने और वहां पार्टी को मजबूत करने की तैयारी कर रहा है. उन्होंने अतीत में केरल में विधानसभा चुनाव भी लड़ा था, हालांकि उस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी उन्हें केरल की राजनीति में क्या बड़ी जिम्मेदारी सौंपती है।



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