महिला दिवस पर जवाहर कला केंद्र जयपुर मे नये प्रयोगों नये कलेवर के साथ प्रस्तुत किया गया
जयपुर|BDC News|bhopalonline,org
फिर आषाढ़ का एक दिन
इस नाटक आषाढ़ के एक दिन को करने का एकमात्र कारण यह है कि हिन्दी रंग जगत के अधिकांश दर्शक, रंगकर्मी मानते है की यह कृति हिन्दी नाटकों में शीर्ष स्थान पर है किंतु सीधे तौर पर उसे आज के दौर में देख नहीं पाते, मैंने यही कोशिश की है की इस नाटक को आज के समय का बनाने का प्रयास किया है मूल नाटक को साथ रखते हए, मूल कहानी और वर्तमान समय दोनों एक साथ मंच पर साथ साथ चलते हैं, दो मल्लिका, दो कालिदास, दो विलोम के साथ यह नाटक आज और कल को एक साथ लेकर चलता है,
आइये क्यों की ये रंग प्रयोग आपके बिना संभव नहीं है,
नाटक फिर आषाढ़ का एक दिन
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जिस तरह मूल नाटक में कालिदास एक राइटर है उसी तरह फिर आषाढ़ का एक दिन नाटक में एक पेंटर वरुण काले,
जो बहुत अच्छा पेंटर है, अपने गाँव में अपनी बस्ती में रहता है,
मिताली जो मूल नाटक में मल्लिका है, वरुण से बहुत प्रेम करती है,
वरुण का काम राजा भाऊ जो एक पॉलिटिशियन है और उसकी बहुत सी आर्ट गैलरी भी है, रहा भाऊ वरुण को इंटरनेशनल अवार्ड दिलाकर उसके बहुत से शो कराना चाहता है, राजा भाउ जानता है की वरुण एक दिन बहुत बड़ा पेंटर बनेगा, इसी लिए वो वरुण पर इन्वेस्टमेंट करना चाहता है वो चाहता है की वरुण उसके पास दिल्ली आ जाये, वरुण को बुलाने के लिए राजा भाऊ अपने पी.ए. को भेजता है वरुण को लाने को,
वरुण राजा भाऊ के लोगों के साथ दिल्ली नहीं जाना चाहता , वो अपनी बस्ती अपने गाँव में ही रहता चाहता है, पर पर वरुण का मामा और बाक़ी सब ये चाहते हैं कि वरूण दिल्ली चला जाये क्यों की वहाँ जाने से वरुण बहुत फ़ेमस हो जाएगा, बहुत बड़ा आदमी बन जाएगा, पर वरुण जाना नहीं चाहता,
ये बात मिताली को जब ये पता चलता है तो वो वरुण को मनाती है की वो जाये, वरुण उससे कहता है की वहाँ की लाइफ बहुत सारी चीज़े छीन भी लेगी, लेकिन मिताली उसे ज़ोर देकर जाने के लिए कहती है, वहीं दूसरी तरफ़ विभोर जो मूल नाटक में विलोम है चाहता है की वरुण मिताली से शादी कर के दिल्ली जाए, आई मिताली की माँ जो जानती है की वरुण शादी किए बिना चला जाएगा, आई कहती भी है की वरुण बहुत चालाक है वो सिर्फ़ अपने बारे में सोचता है,
वरुण को अगले दिन ही सुबह जाना है और वो निकल जाता है,
वरुण फिर लौट के मिताली के पास नहीं आता, वरुण की पेंटिंग बहुत बिकने लगती है, वरुण बहुत फ़ेमस हो जाता है, राजा भाऊ की लड़की उस से शादी हो जाती, और वो पेंटिंग छोड़ कर पॉलिटिक्स जॉइन कर लेता
और यहाँ मिताली उसकी यादों के ज़िंदगी गुज़ार रही है, मिताली की आई गुज़र चुकी है, मल्लिका जैसे तैसे अपनी ज़िंदगी काट रही है पर वो वरुण से किसी तरह की कोई मदद नहीं माँगती, जीवन को जीने के लिए बहुत से समझौते इंसान को करने होते है पर वो समझौते केवल आप ही को पता होते हैं,
नाटक के अंत में पता चलता है
की राजा भाऊ मर है और पार्टी में विरोध उत्पन्न हो गया है,
वरुण सब कुछ छोड़ कर वापस मुंबई के पास अपने गाँव आ जाता है मिताली के पास,
जिसे दिन मिताली के घर पहुँचता है उस दिन वैसा ही आषाढ़ का एक दिन है जैसा उसके जाने के दिन का था, वरुण अपने जीवन की वो सारी घटनाएँ बताता है पश्चाताप करता है मिताली के सामने वो सारी बात बताता है कि क्यों वो इतने सालों में उससे मिलने नहीं आ पाया, कैसे उसने इतने साल बिताये हैं अब वो शुरू से जीवन शुरू करना चाहता है,
लेकिन उसे पता चलता है की मिताली की एक बच्ची है, और विभोर मिताली के यहाँ रहता है, विभोर इतने सालों से अंदर रखे ग़ुस्से की वरुण के सामने निकाल देता है, और चला जाता है,
वरुण जो लौट कर आया था मितली के पास वो लौट जाता है वापस ये कह कर की समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता,
नाटक के सारे तत्वों की प्रयोगात्मक प्रस्तुति कहा जा संकरा है इस नाटक को ,लाइट, सेट, अभिनय, कॉस्ट्यूम, स्क्रिप्ट,
साथ ही मूल नाटक में कोई गाना नहीं है पर इस प्रस्तुति में परिस्थिति के अनुरूप एक गीत डाला है ,
जाओ सजन मोरा
मन करे हलचल
पल पल मन समझाऊँ
दरद कहाँ ले जाऊँ.