बिजली संकट का होगा स्थायी समाधान
गोवा। डिजिटल डेस्क
BDC NEWS | bhopalonline.oeg
भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने और भविष्य के ईंधन ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है। इसी कड़ी में गोवा के तट पर एक अत्यंत महत्वाकांक्षी और क्रांतिकारी हाइब्रिड बिजली परियोजना जल्द ही धरातल पर उतरने वाली है। CSIR-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशनोग्राफी (NIO) के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह तकनीक न केवल पारंपरिक बिजली उत्पादन के तरीकों को चुनौती देगी, बल्कि यह सालभर निर्बाध ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने का एक नया माध्यम बनेगी।
क्या है यह अनोखा हाइब्रिड पावर प्रोजेक्ट?
गोवा के तट पर स्थापित होने वाला यह प्रोजेक्ट एक लचीले (Flexible) तैरते हुए प्लेटफॉर्म पर आधारित है। आमतौर पर सोलर एनर्जी की सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि मानसून के दौरान धूप की कमी से बिजली उत्पादन कम हो जाता है। इस हाइब्रिड सिस्टम की खासियत यह है कि यह ‘सीजनल कॉम्प्लिमेंटेरिटी’ (Seasonal Complementarity) पर काम करता है। यानी, जब मानसून में सोलर पावर कम होगी, तब यह सिस्टम समुद्री हवा और लहरों की प्रचंड ऊर्जा का उपयोग करेगा। वहीं, गर्मियों में यह सौर ऊर्जा के माध्यम से बिजली उत्पन्न करेगा। CSIR-NIO के निदेशक सुनील कुमार सिंह के अनुसार, यह तकनीक बिजली के स्थायी समाधान के रूप में देखी जा रही है।
यह तकनीक काम कैसे करेगी?
इस प्रोजेक्ट की कार्यप्रणाली को तीन चरणों में समझा जा सकता है:
- परीक्षण और सुरक्षा: सबसे पहले एक छोटे प्लेटफॉर्म के जरिए इसकी टेस्टिंग की जा रही है। सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि खराब मौसम या मानसून के दौरान इसे आसानी से तट के करीब सुरक्षित स्थान पर लाया जा सके।
- अनुकूलन क्षमता (Adaptability): यह प्लेटफॉर्म पूरी तरह से स्थिर (Rigid) नहीं होगा, बल्कि लचीला होगा ताकि समुद्र की भारी लहरों और तूफानी हवाओं के दबाव को झेल सके।
- सालभर संचालन: सिस्टम मौसम के अनुसार खुद को ढाल लेगा, जिससे ऊर्जा का उत्पादन कभी नहीं रुकेगा।
इंजीनियरिंग की चुनौतियां और समाधान
इस प्रोजेक्ट में सबसे बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती ‘मूरिंग सिस्टम’ (Mooring System) को समुद्र में स्थिर बनाए रखना है। समुद्र के बदलते हालात और प्रचंड लहरों के बीच इस प्लेटफॉर्म को सुरक्षित रखना एक जटिल कार्य है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इसे पूरी तरह सख्त न बनाकर एक ‘फ्लेक्सिबल ढांचा’ दिया गया है, ताकि समुद्र की लहरें इसे नुकसान न पहुँचा सकें। दक्षिण गोवा के तट को इसके लिए इसलिए चुना गया है क्योंकि यहाँ हवा की स्थिति राज्य के अन्य तटीय इलाकों की तुलना में ऊर्जा उत्पादन के लिए अधिक अनुकूल है।
भविष्य का ईंधन: समुद्र के बीचों-बीच बनेगी ‘ग्रीन हाइड्रोजन’
इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका ‘अगला फेज’ है। आमतौर पर समुद्र में बनने वाली बिजली को जमीन तक लाने के लिए लंबी और महंगी केबल बिछानी पड़ती है, जो बहुत खर्चीली होती है।
- सीधे उत्पादन: नई तकनीक के जरिए बिजली को केबल से भेजने के बजाय, समुद्र के पानी का उपयोग करके वहीं ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ गैस बनाई जाएगी।
- परिवहन में आसानी: समुद्री पानी से नमक अलग कर हाइड्रोजन तैयार की जाएगी, जिसे टैंकों में भरकर आसानी से फैक्ट्रियों और वाहनों तक पहुँचाया जा सकेगा।
- लागत में कमी: यह प्रक्रिया बिजली के ट्रांसमिशन पर होने वाले भारी खर्च को समाप्त कर देगी, जिससे हाइड्रोजन फ्यूल को एक किफायती और सुलभ ईंधन बनाया जा सकेगा।
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