एक साल तक सोना न खरीदें.. तेल, खाद और पेट्रोल-डीजल के उपयोग में कटौती करें… कंपनियां वर्क फ्रॉम होम पर जाएं.. यह तमाम सलाह पीएम नरेन्द्र मोदी ने जनता को दी है।
देश चलाना, अब कंप्रोमाइज्ड.. पीएम के वश की बात नहीं है। नाकामी के बाद सारी जिम्मेदारी पीएम जनता के ऊपर थोप देते हैं। प्रधानमंत्री के बयान के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पलटवार किया है।
नई दिल्ली.
BDC News | bhoplalonline.org
वैश्विक अस्थिरता और घरेलू आर्थिक दबावों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता से कड़े और संयमित कदम उठाने का आग्रह किया है। प्रधानमंत्री ने देशवासियों को सलाह दी है कि वे कम से कम एक साल तक सोने की खरीद से बचें और तेल, खाद, पेट्रोल एवं डीजल के उपयोग में यथासंभव कटौती करें। इसके साथ ही, उन्होंने कॉर्पोरेट जगत और कंपनियों से एक बार फिर ‘वर्क फ्रॉम होम’ (घर से काम) की संस्कृति को अपनाने का सुझाव दिया है ताकि ईंधन की खपत और परिचालन लागत को कम किया जा सके।
पीएम मोदी के इस बयान को देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति और विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव से जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार का मानना है कि यदि जनता इन बुनियादी चीजों के उपभोग में कटौती करती है, तो इससे आयात बिल में कमी आएगी और अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
“नाकामी की जिम्मेदारी जनता पर थोपना बंद करें”
प्रधानमंत्री के इस संबोधन के तुरंत बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उन पर कड़ा प्रहार किया है। राहुल गांधी ने कहा कि देश चलाना अब प्रधानमंत्री के “वश की बात” नहीं रही है और वे अपनी प्रशासनिक विफलताओं का बोझ आम जनता के कंधों पर डाल रहे हैं। राहुल गांधी ने ट्वीट कर और मीडिया से बात करते हुए कहा कि “नाकामी के बाद सारी जिम्मेदारी जनता के ऊपर थोप देना प्रधानमंत्री की पुरानी आदत बन चुकी है।”
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार महंगाई, बेरोजगारी और गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने में पूरी तरह विफल रही है। उन्होंने तर्क दिया कि जब सरकार के पास कोई ठोस नीति नहीं बचती, तो वह जनता से ‘त्याग’ और ‘समझौते’ (कॉम्प्रोमाइज) की उम्मीद करने लगती है। राहुल गांधी के अनुसार, जनता पहले से ही महंगाई की मार झेल रही है, ऐसे में तेल और डीजल जैसी बुनियादी जरूरतों में कटौती की सलाह देना संवेदनहीनता है।
वैश्विक हालात और बढ़ता संकट
मौजूदा समय में पूरी दुनिया एक कठिन आर्थिक दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया (Middle East) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध जैसी स्थितियों ने कच्चे तेल की कीमतों को अस्थिर कर दिया है। इसके अलावा, वैश्विक सप्लाई चेन बाधित होने से खाद और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भारी उछाल आया है।
दुनिया भर के केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति और बढ़ता व्यापार घाटा सरकार के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री ने सोने के आयात को कम करने की बात कही है, क्योंकि भारत दुनिया में सोने का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और इसका भारी आयात विदेशी मुद्रा भंडार को प्रभावित करता है।
नीतिगत विफलता या सामूहिक जिम्मेदारी?
इस पूरे घटनाक्रम ने देश में एक नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ जहां सत्ता पक्ष इसे “सामूहिक जिम्मेदारी” और “राष्ट्र निर्माण में जनता की भागीदारी” बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे “नीतिगत विफलता” करार दे रहा है। आम जनता के लिए यह स्थिति ऊहापोह वाली है, क्योंकि महंगाई के इस दौर में उपभोग कम करना उनकी मजबूरी और जरूरत दोनों बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार इन अपीलों के बाद कोई राहतकारी नीतिगत कदम उठाती है या राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला और तेज होता है।
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12 साल में देश को इस मुकाम पर ला दिया है कि जनता को बताना पड़ रहा है – क्या खरीदे, क्या न खरीदे, कहां जाए, कहां न जाए। हर बार जिम्मेदारी जनता पर डाल देते हैं ताकि खुद जवाबदेही से बच निकलें। देश चलाना अब कंप्रोमाइज्ड पीएम के बस की बात नहीं।




