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जबलपुर क्रूज हादसा: जल समाधि लेती व्यवस्था और सिस्टम की ‘खूनी’ लापरवाही

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जबलपुर के बरगी बांध में हुआ क्रूज हादसा महज एक ‘दुर्घटना’ नहीं, बल्कि व्यवस्थागत विफलता और प्रशासनिक संवेदनहीनता का जीता-जागता प्रमाण है। जब तंत्र की रगों में जवाबदेही के बजाय लापरवाही दौड़ने लगे, तो जल पर्यटन के नाम पर सजे ये आलीशान क्रूज ‘मौत के तैरते ताबूत’ बन जाते हैं।

विशेष टिप्पणी. अजय तिवारी
BDC News | bhopalonline.org

जबलपुर के बरगी बांध के अथाह जल में जो डूबा, वह केवल एक क्रूज या उसमें सवार जिंदगियां नहीं थीं, बल्कि वह प्रदेश का वह ‘सिस्टम’ था जो कागजों पर तो चाक-चौबंद दिखता है, लेकिन हकीकत के धरातल पर पूरी तरह खोखला हो चुका है। नर्मदा की लहरों पर जब सैलानी सुकून के दो पल तलाशने निकलते हैं, तो उन्हें क्या पता कि पर्यटन विभाग के रंगीन विज्ञापनों के पीछे मौत का जाल बिछा हुआ है। हालांकि सिस्टम जब बेपरवाह था, तब क्रूज सवार भी बेपरवाह थे, ऐसा हादसे के पहले की सामने आ रहे वीडियो चींख-चींख कर कह रहे हैं।

लापरवाही का क्रोनोलॉजी: नियम ताक पर, मुनाफा सर्वोपरि

इस पूरे हादसे की अगर परतें उधेड़ी जाएं, तो हर मोड़ पर केवल और केवल लापरवाही नजर आती है। पहला सवाल तो क्रूज की क्षमता और उसके रखरखाव पर उठता है। क्या इस क्रूज का समय-समय पर ‘फिटनेस टेस्ट’ हुआ था? अक्सर देखा जाता है कि पर्यटन के पीक सीजन में अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के चक्कर में क्रूज और नावों की क्षमता से अधिक सैलानियों को बैठा लिया जाता है। सुरक्षा मानकों को दरकिनार करना यहाँ की नियति बन चुकी है। क्या लाइफ जैकेट्स पर्याप्त थे? क्या इमरजेंसी एग्जिट और रेस्क्यू उपकरणों की स्थिति काम करने लायक थी? इन सवालों के जवाब भ्रष्टाचार की फाइलों में दबे हुए हैं।

बेपरवाह सिस्टम: हादसों से नहीं ली सीख

हैरत की बात यह है कि मध्यप्रदेश में यह कोई पहला जल हादसा नहीं है। इससे पहले भी प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में नाव और क्रूज पलटने की घटनाएं हो चुकी हैं, लेकिन हमारा प्रशासनिक अमला ‘कुंभकर्णी नींद’ से तभी जागता है जब लाशें पानी के ऊपर तैरने लगती हैं। हादसे के बाद दो-चार जांच कमेटियां बना दी जाती हैं, कुछ छोटे कर्मचारियों को निलंबित कर इतिश्री कर ली जाती है, लेकिन उन ‘बड़े मगरमच्छों’ पर कभी हाथ नहीं डाला जाता जो बिना सुरक्षा मानकों के इन जलयानों को चलाने की अनुमति देते हैं।

एसडीआरएफ और रेस्क्यू का ‘तमाशा’

हादसे के बाद जब रेस्क्यू टीम मौके पर पहुँचती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। जबलपुर जैसे महत्वपूर्ण केंद्र में, जहाँ बरगी जैसा विशाल जलाशय है, क्या वहां त्वरित रेस्क्यू के लिए अत्याधुनिक संसाधनों की कमी नहीं थी? आपदा प्रबंधन के नाम पर करोड़ों का बजट ठिकाने लगा दिया जाता है, लेकिन जब वास्तविक संकट आता है, तो सिस्टम असहाय और लाचार नजर आता है। यह बेपरवाही उन परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है जिन्होंने अपनों को खोया है।

पर्यटन के नाम पर ‘मौत का व्यापार’

सरकार प्रदेश को पर्यटन हब बनाने का दावा करती है, ‘हिंदुस्तान का दिल देखो’ जैसे नारे उछालती है, लेकिन क्या सैलानियों की सुरक्षा की कोई गारंटी है? बरगी बांध का यह क्रूज हादसा चीख-चीख कर कह रहा है कि यहाँ जान की कीमत कौड़ियों के भाव है। ठेकेदारों की मनमानी और अधिकारियों की मिलीभगत ने पर्यटन स्थलों को डेंजर जोन में बदल दिया है। नियमों का पालन करवाने वाली एजेंसियां केवल वसूली तक सीमित रह गई हैं।

अब कागजी कार्रवाई नहीं, कड़े प्रहार की जरूरत

जबलपुर का यह हादसा सिस्टम के गाल पर एक जोरदार तमाचा है। अगर अब भी प्रशासन नहीं चेता, तो भविष्य में होने वाले हादसों की जिम्मेदारी भी सीधे तौर पर इसी बेपरवाह तंत्र की होगी। केवल मुआवजे की घोषणा कर देने से जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। जरूरत है उन अधिकारियों पर आपराधिक मुकदमा चलाने की, जिनकी नाक के नीचे सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाई गईं।

बरगी की लहरें आज सवाल पूछ रही हैं—कि आखिर कब तक मासूमों की जान देकर सिस्टम अपनी नींद पूरी करेगा? जवाबदेही तय होनी चाहिए, वरना ‘लापरवाही का यह क्रूज’ ऐसे ही चलता रहेगा और आम आदमी इसमें डूबता रहेगा। हादसे में काल के गाल में समाए लोगों की कमी किसी तरह का मुआवजा पूरा नहीं कर सकता।


  • क्षमता से अधिक भार: मुनाफे के लिए सुरक्षा से समझौता।
  • फिटनेस का अभाव: तकनीकी जांच में घोर लापरवाही।
  • प्रशासनिक मौन: हादसों के बाद भी नियमों का सख्त पालन न कराना।
  • सुरक्षा उपकरणों की कमी: लाइफ जैकेट और आपातकालीन सुविधाओं की अनुपलब्धता।

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