विष्णु गेहानी जी का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि उस ‘जुनून’ और ‘जज्बे’ के एक युग का अवसान है, जिसने हजारों नौनिहालों के भविष्य की नींव रखी। 7 जनवरी की वह अलसुबह, जब ब्रह्म मुहूर्त में प्रकृति स्वयं मौन थी, तब एक ऐसी आत्मा ने अंतिम सांस ली जिसने अपना पूरा जीवन दूसरों को सांस लेने योग्य बनाने में खपा दिया।
अजय तिवारी
भारतीय मनीषा में कहा गया है कि कुछ लोग ‘निमित्त’ मात्र होते हैं, लेकिन कुछ लोग ‘स्तंभ’ होते हैं। विष्णु गेहानी जी एक ऐसे ही स्तंभ थे, जिनके कंधों पर हजारों बच्चों के सपनों का बोझ लदा था, जिसे उन्होंने बोझ नहीं बल्कि ‘ईश्वरीय आशीर्वाद’ समझा।
जड़ों से कटने का दर्द और संकल्प की भूमि
गेहानी जी का जीवन सफर अविभाजित भारत के उस सिंधी समाज की कहानी है, जिसने विभाजन की विभीषिका को अपनी आंखों से देखा। अपनी जड़ों से कटकर, अपनी मिट्टी को पाकिस्तान में छोड़कर, अपनी मां के साथ जब उन्होंने विभाजित भारत की सीमा में कदम रखा, तो उनके पास केवल संघर्ष की पूंजी थी। लेकिन यह संघर्ष उन्हें तोड़ने के बजाय उन्हें गढ़ने वाला साबित हुआ।
जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने जटिल से जटिल परिस्थितियों का सामना किया, लेकिन कभी अपने स्वाभिमान और मूल्यों से समझौता नहीं किया। सरकारी नौकरी की सुरक्षा उन्हें रास नहीं आई, क्योंकि उनकी आत्मा किसी बड़े लक्ष्य के लिए तड़प रही थी। वे केवल अपना घर नहीं भरना चाहते थे, वे उन घरों में उजाला करना चाहते थे जहां अभावों का अंधेरा था।
संत के चरणों में शिक्षा का संकल्प
विष्णु गेहानी जी के जीवन का टर्निंग पॉइंट संत हिरदाराम जी की सीख थी। संत के सान्निध्य में उन्होंने जाना कि मानव सेवा ही माधव सेवा है। उन्होंने आर्थिक रूप से कमजोर पीढ़ी को शिक्षित करने का जो संकल्प लिया, वह महज एक सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि उनकी ‘साधना’ बन गई।
आज की ‘नवयुवक सभा’ की शिक्षण संस्थाएं और ‘साधु वासवानी स्कूल’ की जो भव्य इमारतें और प्रतिष्ठा हमें दिखाई देती हैं, उनके निर्माण की हर ईंट में गेहानी जी के पसीने की गंध और उनके विजन की चमक है। उन्होंने इन संस्थाओं को केवल एक विद्यालय के रूप में नहीं, बल्कि संस्कारों के केंद्र के रूप में रोपा था। आज जो वटवृक्ष हमें छांव दे रहे हैं, गेहानी जी उनके वह माली थे जिन्होंने जड़ों को अपने खून से सींचा था।
हजारों बच्चों के ‘अभिभावक’ और शिक्षकों के ‘मॉनिटर’
एक सामान्य शिक्षाविद और गेहानी जी में यही अंतर था कि वे बच्चों के लिए केवल प्रबंधन का हिस्सा नहीं थे, बल्कि एक पिता तुल्य अभिभावक थे। सुबह से शाम तक उनकी चिंता का केंद्र केवल और केवल बच्चे होते थे। सत्र की शुरुआत से लेकर परीक्षा के अंतिम दिन तक उनकी सक्रियता किसी ऊर्जा पुंज की तरह विद्यालयों में संचारित होती थी।
वे केवल बच्चों के ही नहीं, बल्कि शिक्षकों के भी ‘मॉनिटर’ थे। उनकी खनकदार आवाज में अनुशासन और प्रेम का एक अद्भुत समन्वय था। उन्होंने शिक्षकों को सिखाया कि शिक्षा केवल ब्लैकबोर्ड पर लिखे अक्षर नहीं हैं, बल्कि बच्चे के चरित्र का निर्माण है। जो भी उनसे मिलता, वह ‘गेहानीमय’ हो जाता था। उनकी बातों में अपनी संस्कृति, सिंधी भाषा और ‘सिंधियत’ का जो गौरव झलकता था, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल है।
सादगी और सम्मान का पर्याय
गेहानी जी के व्यक्तित्व में वह सादगी थी जो केवल महान आत्माओं में पाई जाती है। सबको सम्मान देना उनका स्वभाव था। “सम्मान” शब्द के जितने भी पर्याय हो सकते हैं, वे सब गेहानी जी के व्यवहार में जीवंत हो उठते थे। नौ दशक के लंबे सफर में उन्होंने हजारों बच्चों को लक्ष्य तय करना और उन्हें हासिल करना सिखाया।
मृत्यु के समीप होकर भी उनकी चिंता स्वयं के लिए नहीं थी। अपने अंतिम क्षणों में भी वे यही जानना चाह रहे थे कि “उनका स्कूल ठीक से चल रहा है या नहीं?” यह प्रश्न दर्शाता है कि एक व्यक्ति जब अपने कार्य को ईश्वर मान लेता है, तो अंतिम श्वास तक उसे वही धुन लगी रहती है।
एक अपूरणीय क्षति और विरासत
ब्रह्म मुहूर्त की वह बेला उन्हें अनंत की यात्रा पर ले गई, लेकिन वे पीछे छोड़ गए हैं एक ऐसी विरासत जो सदियों तक समाज का मार्गदर्शन करेगी। गेहानी जी का जाना एक ऐसे ‘जुनून’ का जाना है जो अब विरल होता जा रहा है।
विष्णु गेहानी जी देह के रूप में हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन साधु वासवानी स्कूल की गलियारों में, बच्चों की खिलखिलाहट में और हर उस छात्र की सफलता में उनकी उपस्थिति महसूस की जाएगी, जिसने उनके मार्गदर्शन में अपना जीवन संवारा है। वे एक ऐसे सारथी थे जिन्होंने कभी रथ रुकने नहीं दिया।
विष्णु गेहानी जी का जीवन हमें सिखाता है कि अगर संकल्प अडिग हो और हृदय में बच्चों के प्रति प्रेम हो, तो एक अकेला व्यक्ति भी समाज की दिशा बदल सकता है। वे सादगी, संघर्ष और समर्पण के वह त्रिवेणी संगम थे, जिन्हें इतिहास हमेशा सम्मान के साथ याद रखेगा।
अंत में.. बहुत साफगोई से लिख रहा हूं, वे जिस दायित्व का निर्वहन पूरी निष्ठा से दशकों से करते आ रहे थे। उसे बहुत हद तक सम्मानजनक तरीके से कम किया गया था, जो उनके लिए निश्चय ही पीड़ा दायक था। हालांकि वह उस दायित्व से अप्रत्यक्ष जुड़े रहे। लेकिन उनके आसपास रहने वालों का मानना है, वह बदलाव से टृट जरूर गए थे। गेहानीजी हमेशा कहते थे- मेरा अंतिम सांस बच्चों के बीच रहते हुए निकले। अलविदा गेहानीजी.. विनम्र श्रद्धांजलि..
भोपाल डॉट कॉम परिवार की और गहन संवेदना और शोकाकुल क्षण… ऊं शांति..
अंतिम संस्कार गुरूवार को होगा
- अंतिम संस्कार 08 जनवरी 2026 दिन गुरुवार दोपहर 12 बजे अंतिम यात्रा निकलेगी
- संत वासुराम दरबार पर माथा टेका जाएगा
- साधु वासवानी स्कूल, संत जी की कुटिया पर माथा टेका जाएगा
- नव युवक सभा स्कूल भवन के मंदिर में माथा टेका जाएगा।
- वेकुण्ड धाम संत हिरदाराम नगर विश्राम घाट पर दाह संस्कार किया जाएगा
(जैसा माधु चांदवानी, पूज्य सिंधी पंचायत अध्यक्ष ने बताया)
शोक सभाएं हुईं
श्री विष्णु गेहानी के निधन पर साधु वासवानी स्कूल, नवयुवक सभा व संस्कार स्कूल में श्रद्धांजलि सभाएं हुईं। जहां हजारों बच्चों ने गेहानीजी को नम आंखों से याद किया। समाजसेवियों-शिक्षा जगत से जुड़े लोगों ने कहा- गेहानीजी ने एक पीढ़ी को शिक्षित किया है उनकी सेवाओं को हमेशा याद रखा जाएगा।