शिवपुरवा/सोनभद्र: अक्सर यह कहा जाता है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती, बस उसे सही मंच और थोड़े से मार्गदर्शन की जरूरत होती है। इसी सोच को हकीकत में बदलते हुए ‘दि अघोरा सोसाइटी फॉर आर्ट, कल्चर एंड सोशल वेलफेयर’ (ASFA) ने ग्रामीण अंचल के बच्चों की किस्मत संवारने का एक बड़ा बीड़ा उठाया।
सोमवार, 9 फरवरी को इस मुहिम का शानदार समापन एक भव्य ‘अंतर-विद्यालयीन प्रतियोगिता’ के साथ हुआ। इस कार्यक्रम में न केवल बच्चों का आत्मविश्वास दिखा, बल्कि यह भी साबित हो गया कि यदि अवसर मिले तो गांव के बच्चे भी किसी से कम नहीं हैं।
तीन प्रमुख स्कूलों के बीच हुआ कड़ा मुकाबला
इस प्रतियोगिता का मुख्य आकर्षण क्षेत्र के तीन प्रतिष्ठित विद्यालयों के बीच की भिड़ंत रही। इन स्कूलों के छात्रों ने महीने भर की ट्रेनिंग के बाद अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया:
- आर.बी.एस. पब्लिक स्कूल, सुपिया
- शासकीय माध्यमिक विद्यालय, शिवपुरवा (601)
- शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, शिवपुरवा (603)
महीने भर चली कार्यशाला के बाद कुल 16 बेहतरीन प्रतिभागियों का चयन किया गया था, जिन्होंने फाइनल मुकाबले में अपनी वाकपटुता (Speaking Skills) और व्यक्तित्व का लोहा मनवाया।
विजेताओं की घोषणा: आराध्या, विकेश और अग्रिमा ने मारी बाजी
जैसे ही मंच पर परिणामों की घोषणा हुई, पूरा परिसर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। निर्णायक मंडल के लिए चयन करना आसान नहीं था, क्योंकि हर बच्चा अपने आप में खास नजर आ रहा था।
शानदार प्रदर्शन करने वाले टॉप 3 सितारे:
- प्रथम स्थान (विजेता): आर.बी.एस. पब्लिक स्कूल की आराध्या सिंह ने अपनी अद्भुत वक्तृत्व शैली और आत्मविश्वास से जजों का दिल जीत लिया।
- द्वितीय स्थान: शासकीय माध्यमिक विद्यालय (601) के विकेश साहू दूसरे स्थान पर रहे। उनकी तार्किक क्षमता की काफी सराहना हुई।
- तृतीय स्थान: आर.बी.एस. पब्लिक स्कूल की ही अग्रिमा गुप्ता ने तीसरा स्थान हासिल कर अपने स्कूल का मान बढ़ाया।
सम्मान और प्रोत्साहन: संस्था द्वारा शीर्ष तीन विजेताओं को 500-500 रुपये का नकद पुरस्कार और योग्यता प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। इसके अलावा, प्रतियोगिता में शामिल होने वाले सभी 16 छात्र-छात्राओं को सहभागिता प्रमाण पत्र दिए गए ताकि उनका मनोबल बना रहे।
निर्णायकों ने बढ़ाया बच्चों का उत्साह
इस कार्यक्रम में मुख्य निर्णायक (Judges) के रूप में भाजपा नेता श्री सुरेंद्र ओझा और प्रसिद्ध समाजसेवी श्री सागर सिंह गहरवार मौजूद रहे। दोनों अतिथियों ने बारीकी से बच्चों के प्रदर्शन का आकलन किया।
बच्चों को संबोधित करते हुए श्री सुरेंद्र ओझा ने कहा:
“ग्रामीण अंचल में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है, बस उन्हें तराशने की जरूरत है। अघोरा सोसाइटी (ASFA) का यह प्रयास वास्तव में सराहनीय है। ऐसे कार्यक्रमों से बच्चों के अंदर का डर खत्म होता है और वे भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार होते हैं।”
महीने भर की कड़ी मेहनत का परिणाम
अघोरा सोसाइटी के पदाधिकारियों ने जानकारी दी कि यह केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं था। इसकी शुरुआत जनवरी महीने में ही हो गई थी।
- उद्देश्य: ग्रामीण बच्चों में छिपी झिझक को दूर करना।
- ट्रेनिंग: महीने भर बच्चों को मंच संचालन, बॉडी लैंग्वेज और पब्लिक स्पीकिंग के गुर सिखाए गए।
- लक्ष्य: बच्चों में प्रतिस्पर्धात्मक (Competitive) गुणों का विकास करना ताकि वे बड़े शहरों के बच्चों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकें।
ग्रामीण समाज पर क्या होगा इसका असर?
इस तरह की कार्यशालाएं ग्रामीण क्षेत्रों में एक ‘साइकोलॉजिकल बदलाव’ लाती हैं। आमतौर पर गांव के छात्र पढ़ाई में अच्छे होने के बावजूद इंटरव्यू या भीड़ के सामने बोलने में हिचकिचाते हैं।
ASFA की इस पहल से:
- बच्चों का आत्मविश्वास (Self-confidence) बढ़ा है।
- अभिभावकों में शिक्षा और व्यक्तित्व विकास के प्रति जागरूकता आई है।
- सरकारी और निजी स्कूलों के बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का माहौल बना है।
निष्कर्ष: उज्ज्वल भविष्य की ओर एक कदम
‘दि अघोरा सोसाइटी’ का यह प्रयास एक मिसाल है कि कैसे छोटे स्तर पर किए गए कार्य बड़े सामाजिक बदलाव की नींव रख सकते हैं। आज के ये नन्हे प्रतिभागी कल के लीडर, अफसर या प्रबुद्ध नागरिक बनेंगे।
समापन समारोह के अंत में सोसाइटी के सदस्यों ने संकल्प लिया कि वे भविष्य में भी इस तरह के आयोजन जारी रखेंगे, ताकि कोई भी हुनर सिर्फ मार्गदर्शन के अभाव में पीछे न रह जाए।
क्या आप भी मानते हैं कि हर स्कूल में ऐसी कार्यशालाएं अनिवार्य होनी चाहिए? अपनी राय हमें कमेंट में बताएं और इस प्रेरक खबर को शेयर करें!