अजय तिवारी. संपादक
यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) द्वारा 15 जनवरी 2026 से लागू किए गए नए ‘इक्विटी रेगुलेशन’ ने देश भर के परिसरों में एक नई वैचारिक जंग छेड़ दी है। 2012 के पुराने नियमों को प्रतिस्थापित करते हुए लाए गए इन प्रावधानों का प्राथमिक उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, लिंग और सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर होने वाले भेदभाव को जड़ से मिटाना है। इसके लिए हर संस्थान में ‘इक्विटी सेल’ (Equity Cell) का गठन अनिवार्य कर दिया गया है, जो सीधे तौर पर छात्रों की शिकायतों का निपटारा करेगी। प्रथम दृष्टया, यह कदम समावेशी शिक्षा की दिशा में एक क्रांतिकारी प्रयास नजर आता है, लेकिन इसके भीतर छिपे कुछ प्रावधानों ने विवाद का मधुमक्खी का छत्ता छेड़ दिया है।
विवाद का मुख्य केंद्र OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) को ‘जातिगत भेदभाव’ की विशेष श्रेणी में शामिल करना है। आलोचकों का तर्क है कि आरक्षण और अन्य संवैधानिक सुरक्षाओं के बाद इस नई श्रेणी के जुड़ने से संस्थानों में ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ या नियमों के दुरुपयोग की संभावना बढ़ सकती है। सामान्य वर्ग के छात्रों के बीच एक अनकहा डर है कि इससे कैंपस का अकादमिक माहौल तनावपूर्ण हो सकता है। दूसरी ओर, शिक्षाविदों का एक बड़ा वर्ग यह सवाल उठा रहा है कि जब वैश्विक रैंकिंग में भारतीय विश्वविद्यालय अपनी गुणवत्ता के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब प्रशासन का पूरा ध्यान अकादमिक उत्कृष्टता के बजाय सामाजिक इंजीनियरिंग पर केंद्रित होना कितना तर्कसंगत है?
निश्चित रूप से, किसी भी छात्र को उसकी पहचान के कारण अपमानित नहीं किया जाना चाहिए, और ‘इक्विटी सेल’ जैसे तंत्र जवाबदेही तय करने के लिए आवश्यक हैं। परंतु, प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि ये सेल केवल दंडात्मक निकाय न बनकर रह जाएं, बल्कि एक ऐसा वातावरण तैयार करें जहाँ संवाद और संवेदना को प्राथमिकता मिले। शिक्षा का उद्देश्य दीवारों को ढहाना है, न कि नए नियमों के माध्यम से छात्रों के बीच खाई को और गहरा करना। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यूजीसी इन विरोधों और आशंकाओं के बीच समानता के अपने इस महत्वाकांक्षी संकल्प को किस तरह जमीन पर उतारता है।