समय की नियति और एक युग का अंत: विष्णु गेहानीभाऊ की वो विदाई, जिसने संतनगर को मौन कर दिया

समय की नियति और एक युग का अंत: विष्णु गेहानीभाऊ की वो विदाई, जिसने संतनगर को मौन कर दिया

संतनगर. BDC News
समय का क्रूर सत्य कहते हैं कि समय अपनी नियति से चलता है, वह न किसी की प्रतीक्षा करता है और न ही किसी के लिए रुकता है। बुधवार की उस धुंधली और उदास तड़के जब दुनिया गहरी नींद में थी, संतनगर की एक महान आत्मा ने अपनी अंतिम सांस ली। विष्णु गेहानी, जिन्हें पूरा शहर आदर से ‘भाऊजी’ कहता था, हमें छोड़कर उस अनंत यात्रा पर निकल पड़े जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता। गुरुवार का दिन संतनगर के इतिहास में एक खालीपन की इबारत लिख गया, जब हजारों नम आंखों ने अपने प्रिय ‘गेहानीभाऊ’ को अंतिम विदाई दी।

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स्वयं तय किया था सफर का हर ठहराव
महान व्यक्तित्व अक्सर अपनी विदाई का आभास पा लेते हैं। गेहानीजी ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में स्वयं ही अपनी अंतिम यात्रा के पड़ाव तय कर दिए थे। यह केवल एक संयोग नहीं था, बल्कि अपनी कर्मभूमि के प्रति उनका अटूट प्रेम था। नियति ने भी उनके फैसले का सम्मान किया और उनकी अंतिम यात्रा ठीक वैसी ही रही, जैसी उन्होंने चाही थी।

साधु वासवानी स्कूल: जहाँ शिक्षा की मशाल जलाई थी
अंतिम सफर का पहला महत्वपूर्ण पड़ाव था—साधु वासवानी स्कूल। जैसे ही उनकी पार्थिव देह स्कूल परिसर में पहुंची, वहां की दीवारें और गलियारे भी जैसे सिसक उठे। यह वही स्थान था जिसे गेहानीजी ने अपने पसीने और संकल्प से सींचा था। यहाँ उन्होंने हजारों बच्चों के भविष्य की नींव रखी। नई पीढ़ी को शिक्षित करने की जो इबारत उन्होंने यहाँ लिखी थी, वह आज संतनगर के घर-घर में उजियारा फैला रही है।

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यहाँ से उनकी देह ‘संतजी की कुटिया’ ले जाई गई। कुटिया के उस शांत वातावरण में, उनके परम शिष्य ने अपने गुरु को अंतिम नमन किया। वह दृश्य इतना हृदयविदारक था कि वहां मौजूद हर व्यक्ति की पलकें भीग गईं। वह शिष्य और गुरु के उस पवित्र बंधन का अंतिम भौतिक मिलन था।

नवयुवक सभा: कर्मयोग का दूसरा नाम
यात्रा का अगला पड़ाव ‘नवयुवक सभा’ बना। यदि साधु वासवानी स्कूल उनकी शिक्षा की प्रयोगशाला थी, तो नवयुवक सभा उनके सामाजिक सुधारों का केंद्र। इन दोनों स्थलों ने मिलकर संतनगर के बौद्धिक और सामाजिक ढांचे का निर्माण किया। विष्णु गेहानी केवल एक नाम नहीं थे, वे एक संस्था थे। उन्होंने सिखाया कि समाज सेवा केवल शब्दों में नहीं, बल्कि ठोस कार्यों में होनी चाहिए। उनके अंतिम सफर में इन स्थलों पर उमड़ी भीड़ इस बात का प्रमाण थी कि उन्होंने ईंट-पत्थरों की इमारतों से ज्यादा लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाई थी।

दोपहर के 12 बजे: जब स्मृतियां सिसकने लगीं
घड़ी की सुइयां जब 12 पर पहुंचीं, संतनगर का कोना-कोना ‘भाऊजी’ की यादों में डूबा हुआ था। उनके निज निवास पर दर्शनार्थियों का तांता लगा था। हर चेहरे पर एक ही भाव था—अपार दुख और कृतज्ञता। वहां मौजूद हर व्यक्ति के जेहन में एक ही कविता गूँज रही थी:

अब नहीं मिलेगी कहीं नयन, भाऊजी की व्यर्थ न आस करो, वे सचमुच ही चले गए, भोली श्रुति पर विश्वास करो।”

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बैकुंठधाम: पंचतत्व में विलीन हुआ एक सितारा
अंतिम विदाई का साक्षी बना ‘बैकुंठधाम’। हजारों लोगों की मौजूदगी में जब उनकी देह अग्नि को समर्पित की गई, तो ऐसा लगा जैसे संतनगर के आकाश का एक सबसे चमकदार सितारा हमेशा के लिए अस्त हो गया। मंत्रोच्चार और सिसकियों के बीच विष्णु गेहानीभाऊ पंचतत्व में विलीन हो गए।

विष्णु गेहानीजी का संदेश और उनकी विरासत गेहानीजी चले गए हैं, लेकिन वे पीछे छोड़ गए हैं—एक समृद्ध शैक्षिक विरासत और सेवा का एक अटूट मार्ग। उनकी सादगी, उनका अनुशासन और शिक्षा के प्रति उनका समर्पण आने वाली कई पीढ़ियों के लिए मशाल का काम करेगा। वे केवल शरीर से विदा हुए हैं, उनके विचार संतनगर की गलियों में, स्कूलों की प्रार्थनाओं में और नवयुवकों के संकल्पों में हमेशा जीवित रहेंगे।

आज संतनगर उदास है, गलियां सूनी हैं और वे कुर्सियां खाली हैं जहाँ बैठकर भाऊजी समाज के भविष्य की योजनाएं बुनते थे। लेकिन मृत्यु केवल देह का अंत है, आत्मा और कार्यों का नहीं। विष्णु गेहानीभाऊ हमेशा हमारे बीच अपनी मुस्कान और अपने कार्यों के माध्यम से उपस्थित रहेंगे।

विष्णु गेहानी: सादगी के वटवृक्ष और शिक्षा के अनथक सारथी

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