इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान वार्ता की बड़ी बातें
इस्लामाबाद:
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साल 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद पहली बार अमेरिका और ईरान के शीर्ष अधिकारी एक मेज पर आमने-सामने बैठे हैं। पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में हो रही यह वार्ता न केवल दो देशों के बीच जारी युद्ध को रोकने के लिए है, बल्कि पूरे मध्य पूर्व (Middle East) की शांति के लिए निर्णायक मानी जा रही है। हालांकि, लेबनान में संघर्ष विराम और हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के नियंत्रण को लेकर दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं।
वार्ता के मुख्य बिंदु और नेतृत्व
इस ऐतिहासिक बैठक में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे हैं, जबकि ईरानी पक्ष की कमान वहां की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बगेर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची के हाथों में है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ इस महत्वपूर्ण शांति प्रक्रिया में मुख्य मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं।
ईरान की 5-सूत्रीय मांगें
ईरानी पक्ष ने वार्ता की शुरुआत में ही अपनी शर्तों को स्पष्ट कर दिया है। तेहरान ने शांति समझौते के लिए एक ‘5-सूत्रीय’ प्रस्ताव पेश किया है-
- लेबनान में संघर्ष विराम: ईरान चाहता है कि लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ जारी सैन्य कार्रवाई तुरंत रोकी जाए।
- हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर संप्रभुता: वैश्विक व्यापार के इस महत्वपूर्ण मार्ग पर ईरान अपना पूर्ण नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय मान्यता चाहता है।
- युद्ध क्षतिपूर्ति: युद्ध के कारण हुए नुकसान के लिए वित्तीय मुआवजे की मांग।
- संपत्ति की बहाली: अमेरिका द्वारा फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों को तत्काल रिलीज करना।
- सुरक्षा गारंटी: भविष्य में अमेरिका या इजराइल द्वारा किसी भी हमले के खिलाफ ठोस सुरक्षा आश्वासन।
अमेरिका का कड़ा रुख
दूसरी ओर, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि वे दबाव में आकर कोई समझौता नहीं करेंगे।
- हॉर्मुज जलमार्ग को खोलना: अमेरिका चाहता है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए “पूरी तरह स्वतंत्र और स्पष्ट” रहे।
- परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम: अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल क्षमता को नियंत्रित करने पर जोर दे रहा है।
- लेबनान पर संशय: इजराइल और अमेरिका, लेबनान में तब तक संघर्ष विराम के पक्ष में नहीं हैं जब तक कि हिजबुल्लाह के निशस्त्रीकरण की स्पष्ट रूपरेखा तैयार न हो जाए।
लेबनान: सबसे बड़ी बाधा?
लेबनान में जारी हिंसा ने वार्ता को जटिल बना दिया है। जहां ईरान लेबनान में शांति को इस पूरी डील का अनिवार्य हिस्सा मान रहा है, वहीं इजराइल वहां अपनी सैन्य बढ़त को कम करने के पक्ष में नहीं दिख रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लेबनान मोर्चे पर सहमति नहीं बनी, तो इस्लामाबाद वार्ता पटरी से उतर सकती है।
आगे की राह
फिलहाल दो सप्ताह के अस्थायी संघर्ष विराम के बीच तकनीकी दौर की बातचीत जारी है। पाकिस्तान के जिन्ना कन्वेंशन सेंटर को इस वार्ता के लिए मुख्य केंद्र बनाया गया है। चीन द्वारा भी इस शांति समझौते को सफल बनाने के लिए गारंटी देने की संभावना जताई जा रही है।
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