मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सिविल जज भर्ती-2022 में आरक्षित वर्ग के कम चयन पर जताई गंभीर चिंता

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सिविल जज भर्ती-2022 में आरक्षित वर्ग के कम चयन पर जताई गंभीर चिंता

जबलपुर, BDC News

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर ने सिविल जज जूनियर डिवीजन भर्ती-2022 के परिणामों में आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के बेहद कम चयन पर कड़ा रुख अपनाया है। 191 पदों के लिए हुई इस परीक्षा में केवल 47 अभ्यर्थियों का चयन हुआ, जबकि 121 पद खाली रह गए। इनमें भी अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग से एक भी अभ्यर्थी का चयन नहीं हुआ और अनुसूचित जाति (SC) वर्ग से भी केवल एक चयन हुआ, जिस पर कोर्ट ने गंभीर चिंता व्यक्त की है।

शुक्रवार को हुई सुनवाई में कोर्ट ने इस मसले को ‘अत्यंत गंभीर’ करार देते हुए परीक्षा सेल को न्यूनतम अंकों में छूट देकर एक नई संशोधित चयन सूची तैयार करने का आदेश दिया है।

कोर्ट के मुख्य निर्देश

हाइकोर्ट ने परीक्षा सेल को निर्देश दिए हैं कि आरक्षित वर्ग को छूट दी जाए।

  • मुख्य परीक्षा: अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के लिए न्यूनतम अंक 45 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के लिए 40 प्रतिशत माने जाएं।
  • साक्षात्कार (Interview): न्यूनतम 20 अंकों की बाध्यता में भी आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को राहत दी जाए।

कोर्ट ने परीक्षा सेल को आदेश दिया है कि इन छूटों के आधार पर तैयार की गई संशोधित सूची अगली सुनवाई में कोर्ट के समक्ष पेश की जाए।

याचिकाकर्ताओं के आरोप

याचिकाकर्ता अभ्यर्थियों की ओर से अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि परीक्षा सेल ने आरक्षण नीति का सही ढंग से पालन नहीं किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि बैकलॉग पदों को अनारक्षित वर्ग में समायोजित करना, न्यूनतम योग्यता के अंकों में छूट न देना, और साक्षात्कार में कम अंक देना आरक्षित वर्ग के साथ भेदभाव दर्शाता है।

भर्ती परीक्षा का विवरण

मध्य प्रदेश सिविल जज, जूनियर डिवीजन 2022 का परिणाम 12 नवंबर को घोषित हुआ था। इस परीक्षा के माध्यम से कुल 191 पद भरे जाने थे। घोषित परिणाम में इंदौर की भामिनी राठी ने प्रदेश में टॉप किया, जबकि गुना की हरप्रीत कौर परिहार दूसरे और रिया मंधानिया तीसरे स्थान पर रहीं।


मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह हस्तक्षेप आरक्षण नीतियों के उचित क्रियान्वयन और सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। 191 पदों के मुकाबले 121 पदों का खाली रह जाना, विशेषकर ST वर्ग से शून्य चयन होना, स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि या तो परीक्षा की प्रक्रिया/योग्यता मानदंड में कोई विसंगति है या आरक्षण नियमों का पालन प्रभावी ढंग से नहीं किया गया। कोर्ट का यह आदेश कि न्यूनतम अंकों में छूट दी जाए, यह सुनिश्चित करेगा कि आरक्षित वर्ग के पात्र अभ्यर्थी केवल कट-ऑफ की सख्ती के कारण अवसर से वंचित न रह जाएं, जो आरक्षण का मूल उद्देश्य है। यह निर्णय बैकलॉग पदों को भरने और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है।

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