बजट सत्र 2026: संसदीय गरिमा पर भारी पड़ी ‘एपस्टीन फाइल्स’ की सनसनी

लोकसभा बहस लोकसभा बहस

अजय तिवारी. संपादक

संसद के भीतर आज जो दृश्य उभरा, उसने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हमारा लोकतंत्र ‘लोकहित’ से भटककर ‘हेडलाइन हंटिंग’ (सुर्खियां बटोरने) का शिकार हो गया है? बजट सत्र, जो कायदे से देश की तिजोरी के हिसाब-किताब, महंगाई की मार और आम आदमी की थाली के संघर्ष पर केंद्रित होना चाहिए था, वह दुर्भाग्यवश विदेशी षड्यंत्रों और सनसनीखेज ‘फाइलों’ के शोर में दफन हो गया।
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा सदन के पटल पर ‘एपस्टीन फाइल्स’ का जिन्न बाहर निकालना न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि विधायी मर्यादाओं के लिहाज से चिंताजनक भी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि जेफरी एपस्टीन का मामला वैश्विक स्तर पर एक जघन्य और गंभीर अपराध की गाथा है, लेकिन क्या बिना किसी ठोस दस्तावेजी साक्ष्य के, देश के जिम्मेदार पदों पर बैठे व्यक्तियों और उद्यमियों का नाम इससे जोड़ना उचित है?

सदन कोई ‘सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म’ नहीं है जहाँ केवल अटकलों के आधार पर चरित्र हनन किया जाए। यदि विपक्ष के पास अकाट्य प्रमाण हैं, तो उन्हें जांच एजेंसियों के सामने रखकर सरकार को कठघरे में खड़ा करना चाहिए। बिना प्रमाण के व्यक्तिगत आक्षेप लगाना उस संसदीय गरिमा को तार-तार करता है, जिसे बनाने में दशकों लगे हैं। वहीं, सत्तापक्ष का केवल रक्षात्मक होना या पुराने पदों की दुहाई देना काफी नहीं है; पारदर्शिता और तथ्यों का स्पष्टीकरण ही इस सनसनी को शांत कर सकता है। देश का युवा बेरोजगारी के आंकड़ों से जूझ रहा है, किसान एमएसपी की गारंटी मांग रहा है और आम गृहिणी रसोई के बजट को लेकर चिंतित है। इन बुनियादी सवालों के बीच चर्चा का केंद्र एक ऐसा विदेशी अपराधी (जेफरी एपस्टीन) बन गया, जिसका भारत के सुदूर गांवों में बैठे व्यक्ति के जीवन से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। यह राजनीति का ‘ग्लोबलाइजेशन’ तो कहा जा सकता है, लेकिन यह ‘जनहित’ की राजनीति का पतन है। जब सदन की ऊर्जा अंतरराष्ट्रीय विवादों की कतरनें सुलझाने में खर्च होती है, तब जनता की बुनियादी समस्याएं हाशिए पर चली जाती हैं।

लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष का होना अनिवार्य है और सरकार को घेरना उसका नैतिक दायित्व है। लेकिन जब घेराबंदी के हथियार केवल विदेशी फाइलें, निजी हमले और सनसनीखेज दावे बन जाएं, तो बहस का स्तर स्वतः गिर जाता है। सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों को यह आत्मचिंतन करना होगा कि संसद ‘व्यक्तिगत स्कोर’ सेट करने का अखाड़ा नहीं, बल्कि नीति-निर्माण का मंदिर है। यदि संसद की गरिमा को विदेशी सनसनी के फेर से नहीं निकाला गया, तो आने वाली पीढ़ियां इस दौर को ‘शोर का युग’ कहेंगी, जहाँ आवाज तो बहुत थी, लेकिन उस आवाज में जनता का दर्द कहीं नहीं था।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *