राष्‍ट्रीय युवा दिवस: सुसंगठित राष्‍ट्र निर्माण में योगदान दे युवा शक्ति

राष्‍ट्रीय युवा दिवस: सुसंगठित राष्‍ट्र निर्माण में योगदान दे युवा शक्ति
  • भूपेन्‍द्र शर्मा / वरिष्‍ठ पत्रकार

स्वामी विवेकानंद ने जिस भारत का स्वप्न देखा था, उसका आधार केवल भौतिक संपन्नता नहीं, बल्कि आत्मिक एवं चारित्रिक श्रेष्ठता थी। उनके अनुसार, राष्ट्र का पुनरुत्थान तभी संभव है, जब देश का युवा वर्ग अपनी सुषुप्त ऊर्जा को पहचानकर ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ के भाव से समाज की सेवा में समर्पित हो जाए…

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहां उसकी नियति का निर्धारण युवाओं की ऊर्जा और उनकी वैचारिक स्पष्टता से होना सुनिश्चित है। यदि हम आज की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक स्थितियों का सूक्ष्म अवलोकन करें, तो पाते हैं कि वर्तमान युवा पीढ़ी तकनीक एवं सूचना के युग में अभूतपूर्व रूप से सशक्त है, किंतु इसी सशक्‍तीकरण के साथ-साथ उनके समक्ष वैचारिक भ्रम की चुनौतियां भी उतनी ही प्रबल हैं। आज का युवा वर्ग वैश्विक स्तर पर भारत को एक विशिष्ट पहचान दिलाने के लिए अपनी मेधा एवं कौशल का प्रदर्शन तो कर रहा है, परंतु राष्ट्र के भीतर पनपती कुछ विघटनकारी प्रवृत्तियां इस प्रगति की राह में रोड़ा बन रही हैं। यह एक कटु सत्य है कि देश के कुछ प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से निकले कुछ युवा, जिन्हें राष्ट्र निर्माण का आधार स्तंभ होना चाहिए था, वे ऐसी गतिविधियों में संलिप्‍त पाए जाते हैं, जो देश के विभाजन तथा विध्वंस की मानसिकता को पोषित करती हैं।

यह स्थिति स्वामी विवेकानंद के उन सपनों के भारत के विपरीत है, जिसमें उन्होंने एक ऐसे सशक्त, संगठित भारत की कल्पना की थी, जो अपनी आध्यात्मिक एवं बौदि्धक शक्ति से विश्व का नेतृत्व करे। विवेकानंद का मानना था कि युवा वह है, जो लोहे की मांसपेशियां एवं फौलाद की नसें रखता हो, किंतु साथ ही जिसका हृदय राष्ट्रभक्ति की अग्नि से प्रज्वलित हो। आज के संदर्भ में ‘विकसित भारत’ एवं भारत को पुनः ‘विश्व गुरु’ के पद पर आसीन करने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परिकल्‍पना को साकार करने के लिए युवाओं को केवल डिग्रीधारी कुशल पेशेवर होने के बजाय ‘राष्ट्र-प्रथम’ की भावना से ओतप्रोत नागरिक बनना होगा। इसके लिए युवाओं को कुछ सुदृढ़ संकल्पों के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है, जिसमें सबसे प्रमुख संकल्प है आत्म-अनुशासन तथा वैचारिक सजगता का। विश्व-स्तर पर वर्तमान में जो कुटिल राजनीति एवं मानवता-विरोधी विचार पनप रहे हैं, वे प्राय: प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय ‘सूचना युद्ध’ या ‘छद्म विमर्श’ के माध्यम से राष्ट्रों को भीतर से खोखला करने का प्रयास करते हैं।

भारतीय युवाओं को यह समझना होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं राष्ट्र की संप्रभुता के बीच एक महीन रेखा होती है, जिसे लांघना अंततः आत्मघाती सिद्ध होता है। देश विरोधी विचारों से लड़ने का अर्थ केवल सड़क पर उतरना नहीं है, बल्कि तर्क, ज्ञान तथा सही इतिहास-बोध के साथ उन विमर्शों पर विजय पाना है, जो भारत की एकता पर प्रहार करते हैं। जब हम ‘राम राज्य’ की कल्पना करते हैं, तो इसका अर्थ केवल एक पौराणिक संदर्भ नहीं, बल्कि एक ऐसी शासन व्यवस्था एवं समाज से है, जहां नैतिकता, न्याय, समानता एवं कर्तव्यपरायणता सर्वोपरि हो। युवा पीढ़ी यदि स्वार्थों से ऊपर उठकर नागरिक के रूप में अपने दायित्‍वों, कर्तव्यों को प्राथमिकता दे, तो राम राज्य की नींव स्वतः ही स्‍थापित हो जाएगी।

भारत को पुनः ‘सोने की चिड़िया’ बनाने का मार्ग आर्थिक आत्मनिर्भरता एवं स्वदेशी नवाचार से होकर निकलता है। आज का युवा उद्यमी बनकर, स्टार्टअप्स के माध्यम से कार्य-व्‍यवसाय सृजित कर एवं वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पादों की धाक जमाकर इस स्वप्न को यथार्थ में बदल रहा है। डिजिटल क्रांति एवं ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में भारत का बढ़ती प्रतिष्‍ठा युवाओं की इसी समझदारी का परिचायक है, परंतु यह भौतिक प्रगति स्थायित्व तभी प्राप्‍त कर सकेगी, जब इसके पीछे एक सुदृढ़ सांस्कृतिक एवं नैतिक चेतना होगी। युवाओं को यह बोध होना चाहिए कि बाहरी शत्रुओं से अधिक घातक वे आंतरिक विचार होते हैं, जो समाज को जाति, पंथ या क्षेत्र के नाम पर बांटते हैं।

एक विकसित भारत के निर्माण के लिए युवाओं को यह प्रतिज्ञा लेनी होगी कि वे किसी भी ऐसी गतिविधि का हिस्सा नहीं बनेंगे, जो देश की अखंडता को चुनौती देती हो। उन्हें शिक्षा का उपयोग विध्वंस के लिए नहीं, बल्कि सृजन के लिए करना होगा। जब एक युवा तकनीक का उपयोग ग्रामीण उत्थान के लिए करता है, जब वह राजनीति में शुचिता लाने का प्रयास करता है तथा जब वह समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान के लिए कार्य करता है, तब वह वास्तविक रूप से भारत को विश्व गुरु बनाने की दिशा में कदम बढ़ाता है। वर्तमान वैश्विक अस्थिरता के दौर में भारत की भूमिका एक ‘शांति दूत’ और ‘समाधान प्रदाता’ की है एवं इस भूमिका को विश्व-स्तर पर तभी स्वीकार्यता मिलेगी, जब हमारा घर, यानी हमारा देश आंतरिक रूप से एकजुट तथा सशक्त होगा। अंततः, युवाओं की भूमिका केवल मतदाता या कर्मचारी तक सीमित नहीं है, वे उस नए भारत के रचयिता हैं, जो अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है एवं जिसकी आंखें भविष्य के आसमान पर टिकी हैं।

राष्ट्र निर्माण के इस महायज्ञ में प्रत्येक युवा की आहुति उसके चरित्र, उसके संकल्प तथा उसकी देशभक्ति के रूप में होनी चाहिए, तभी हम स्वामी विवेकानंद के गौरवशाली भारत एवं आधुनिक भारत के विकसित संकल्पों को सिद्ध कर पाएंगे। युवा पीड़ी को यह समझना होगा कि देश-विरोधी सोच का सामना केवल नारों से नहीं, बल्कि श्रेष्ठ चरित्र एवं उत्कृष्ट उपलब्धियों से किया जा सकता है। आइए, हम सब मिल एक ऐसे भारत का निर्माण करें, जहां तकनीक एवं तर्क के साथ-साथ करुणा एवं राष्ट्रभक्ति का भी वास हो।

जय हिंद, जय भारत।

  • लेखक: वरिष्‍ठ पत्रकार हैं। संपर्क नंबर 9893634566

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