अजय तिवारी, संपादक
दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक बड़ा उलटफेर हो चुका है। बांग्लादेश में हुए आम चुनावों में तारिक रहमान की पार्टी BNP ने 299 में से 165 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया है। दशकों तक शेख हसीना के साथ प्रगाढ़ संबंधों के बाद, अब नई दिल्ली के सामने एक नई कूटनीतिक चुनौती और अवसर दोनों हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान को जीत की बधाई देकर भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के तहत सकारात्मक संकेत तो दे दिए हैं, लेकिन भविष्य की राह इतनी आसान नहीं दिखती।
भारत के लिए बांग्लादेश केवल एक पड़ोसी नहीं, बल्कि उत्तर-पूर्वी राज्यों (Seven Sisters) की सुरक्षा का मुख्य स्तंभ है। पिछले कुछ महीनों में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद बांग्लादेश का झुकाव जिस तरह चीन और पाकिस्तान की ओर दिखा, उसने भारत की रणनीतिक चिंताएं बढ़ा दी हैं। तारिक रहमान के लिए सबसे बड़ी चुनौती भारत के उस भरोसे को फिर से जीतना होगा, जो पूर्व में BNP के कार्यकाल के दौरान कट्टरपंथी ताकतों को मिले कथित प्रश्रय के कारण डगमगा गया था।
भारत की प्राथमिक चिंता सुरक्षा है। शेख हसीना के शासन में उग्रवादी समूहों के खिलाफ जो ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति थी, क्या तारिक रहमान उसे जारी रखेंगे? यदि बांग्लादेश की धरती का इस्तेमाल फिर से भारत विरोधी गतिविधियों के लिए होता है, तो यह दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट पैदा कर सकता है। हालांकि, बहुमत मिलने के बाद तारिक रहमान के शुरुआती बयानों में संतुलित कूटनीति की झलक मिली है।
हालिया अस्थिरता के दौर में बांग्लादेश का चीन और पाकिस्तान के करीब जाना भारत के लिए ‘घेराबंदी’ (String of Pearls) जैसा है। चीन का भारी रक्षा निवेश और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में दखल भारत के लिए सामरिक खतरा है। तारिक रहमान को अब यह तय करना होगा कि वे ‘सॉवरेन’ (संप्रभु) फैसले कैसे लेते हैं। भारत को अपनी आर्थिक सहायता और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स (चटगांव और मोंगला पोर्ट) की गति बढ़ानी होगी ताकि ढाका को यह एहसास रहे कि उसका सबसे विश्वसनीय और प्राकृतिक साझेदार नई दिल्ली ही है।
भारत के लिए सिलिगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) की सुरक्षा सर्वोपरि है। अगर तारिक रहमान की सरकार ‘ट्रांजिट और ट्रांसशिपमेंट’ समझौतों को आगे बढ़ाती है, तो यह भारत के उत्तर-पूर्व के लिए एक वैकल्पिक ‘लाइफलाइन’ साबित होगा। व्यापारिक दृष्टिकोण से, 18 बिलियन डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार और प्रस्तावित CEPA समझौता दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मजबूती प्रदान कर सकता है।
चुनाव परिणाम यह बताते हैं कि जनता ने कट्टरपंथियों को हाशिए पर धकेल दिया है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा एक ज्वलंत मुद्दा बनी हुई है। भारत ऐसी सरकार की उम्मीद करता है जो बांग्लादेश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को सुरक्षित रखे। यदि अल्पसंख्यक सुरक्षित रहते हैं, तो भारत में शरणार्थी संकट और सांप्रदायिक तनाव का खतरा स्वतः कम हो जाएगा।
तारिक रहमान की सरकार के पास इतिहास रचने का मौका है। वे पुरानी कड़वाहटों को भुलाकर भारत के साथ एक नए ‘सोनाली अध्याय’ (Golden Chapter) की शुरुआत कर सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की बधाई कूटनीति का एक हिस्सा है, लेकिन अब गेंद ढाका के पाले में है। भारत को एक ‘सक्रिय और बहुआयामी कूटनीति’ अपनानी होगी, जो व्यक्ति केंद्रित न होकर ‘सिस्टम’ और ‘संस्था’ केंद्रित हो, ताकि साझा विकास का सपना साकार हो सके।