नई दिल्ली | BDC News|bhopalonline.org
देश की सर्वोच्च अदालत ने बेटियों की शिक्षा और गरिमा को सुरक्षित करने के लिए कड़ा रुख अख्तियार किया है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को निर्देश दिया कि भारत के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में छात्राओं को मुफ्त सैनेटरी पैड उपलब्ध कराना अब कानूनी रूप से अनिवार्य होगा। साथ ही, स्कूलों को लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग वॉशरूम और दिव्यांगों के अनुकूल (Disable Friendly) टॉयलेट बनाने होंगे। कोर्ट ने चेतावनी दी कि जो स्कूल इन मानकों को पूरा नहीं करेंगे, उनकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी।
गरिमा और समानता का अधिकार: कोर्ट की बड़ी टिप्पणियाँ
मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने इस मामले को संविधान के मौलिक अधिकारों से जोड़ते हुए दो महत्वपूर्ण तर्क दिए।
- अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार): यदि स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट और पैड की सुविधा नहीं है, तो वे लड़कों की तुलना में पिछड़ जाती हैं। यह बराबरी के अधिकार का उल्लंघन है।
- अनुच्छेद 21 (गरिमा का अधिकार): मासिक धर्म के दौरान सम्मानजनक सुविधाएं मिलना ‘जीवन के अधिकार’ का हिस्सा है। निजता और स्वच्छता की कमी सीधे तौर पर लड़की की गरिमा को चोट पहुँचाती है।
“लड़कियों का शरीर बोझ नहीं”
कोर्ट ने समाज और व्यवस्था की सोच पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि अक्सर मासिक धर्म के कारण लड़कियों के शरीर को एक ‘बोझ’ के रूप में देखा जाता है, जबकि इसमें उनकी कोई गलती नहीं है। कोर्ट ने कहा, “यह आदेश उन क्लासरूम के लिए है जहाँ लड़कियां मदद मांगने में झिझकती हैं और उन माता-पिता के लिए है जिनकी चुप्पी बेटियों की शिक्षा पर भारी पड़ती है।”
4 साल की कानूनी लड़ाई का सुखद अंत
यह फैसला सोशल वर्कर जया ठाकुर द्वारा 2022 में दायर की गई एक जनहित याचिका (PIL) पर आया है। याचिका में बताया गया था कि गरीबी और संसाधनों की कमी के कारण देश की लाखों लड़कियां पीरियड्स के दौरान स्कूल छोड़ने को मजबूर हैं। पैड की अनुपलब्धता और डिस्पोजल की सुविधा न होने के कारण उनकी पढ़ाई का भारी नुकसान होता है। कोर्ट ने अब केंद्र सरकार की मासिक धर्म स्वच्छता नीति (Menstrual Hygiene Policy) को पूरे देश में सख्ती से लागू करने का आदेश दे दिया है।
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