बैकुंठधाम : दानवीरों ने बहुत हदतक खड़े किए हाथ, अब चंदे का भरोसा

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संतनगर. BDC New
संतनगर का ‘यथाशक्ति बैकुंठधाम’ व्यवस्थाओं के लिहाज से बदहाली के साए में है। दशकों तक जिस विश्रामघाट को समाजसेवियों और दानदाताओं ने अपने दम पर सींचा, आज उसके संचालन क्षमता ने घुटने टेक दिए हैं। बढ़ते खर्चों के कारण बैकुंठधाम में खर्च होने वाली राशि की व्यवस्था नहीं हो पा रही है। विडंबना देखिए, विश्रामघाट पर आज आर्थिक तंगी के कारण ‘अंतिम सफर’ को गरिमापूर्ण बनाए रखने में भी असमर्थ साबित हो रहा है।

पंचायत की चौखट पर व्यवस्था

जब दशकों से खर्च वहन करने वालों ने हाथ खड़े कर दिए, तब जाकर सामाजिक व्यवस्था जागी। बैकुंठधाम की व्यवस्थाओं को लेकर पूज्य सिंधी पंचायत, बर्तन एसोसिएशन और नगर के प्रबुद्धजन पंचायत कार्यालय में बैठे। बैठक में यह कड़वी सच्चाई मौजूदा व्यवस्था पूरी तरह ठीक न होने की बात स्वीकारी गई। पंचायत की अगुवाई में एक ‘विश्रामघाट देखरेख समिति’ बनाने का प्रस्ताव रखा गया।

फंड जुटाने की रणनीति
बैठक में तय किया गया कि नए सिरे से दानदाताओं और समाजसेवियों को खंगाला जाएगा। योजना यह है कि एक बड़ी राशि (कॉर्पस फंड) इकट्ठा की जाए और उसके ब्याज से खर्चों को पूरा किया जाए। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या आज के दौर में केवल ब्याज के भरोसे इतनी बड़ी व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाया जा सकता है? तो अपेक्षा की गई जो राशि दानदाता अभी दे रहे हैं वह अपना सहयो जारी रखेंगे। बता दें कि पगड़ी रस्म जैसी महत्वपूर्ण व्यवस्था के भी पटरी से उतरने के बाद पंचायत ने उसे अपने हाथ में लिया है। अब विश्रामघाट के लिए भी पंचायत ‘अप्रत्यक्ष संरक्षक’ की भूमिका में नजर आ रही है, हालांकि वह सीधे जिम्मेदारी लेने से बच रही है।

चेहरों की मौजूदगी और जवाबदेही का अभाव
इस अहम बैठक में पंचायत अध्यक्ष माधू चांदवानी, एमआईसी मेंबर राजेश हिंगोरानी, नंद दादलानी और जवाहर मूलचंदानी सहित शहर के कई दिग्गज मौजूद रहे। चर्चा तो गंभीर हुई, लेकिन ठोस समाधान अब भी भविष्य के गर्भ में है। समाज के रसूखदारों के बीच यह चर्चा आम है कि यदि समय रहते विश्रामघाट की ओर ध्यान दिया गया होता, तो आज दानदाताओं को “असमर्थता” जताने की नौबत नहीं आती।

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