अजय तिवारी. संपादक
इतिहास खुद को दोहराता है, लेकिन कभी-कभी उसकी कीमत बहुत भारी होती है। हाल के भू-राजनीतिक घटनाक्रमों में ‘ग्रीनलैंड’ एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। अमेरिका की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति और आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ते प्रभाव की चाहत ने यूरोपीय संघ (EU) को एक कड़ा बयान जारी करने पर मजबूर कर दिया है। यूरोपीय संघ की स्पष्ट चेतावनी कि “अगर अमेरिका जबरन ग्रीनलैंड पर कब्जा करता है, तो यह नाटो (NATO) का अंत होगा”, आधुनिक कूटनीति में एक बड़े विवर्तनिक बदलाव (Tectonic Shift) का संकेत है। यह केवल एक द्वीप के मालिकाना हक की बात नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे के टूटने की आहट है जिसने पिछले सात दशकों से पश्चिमी देशों को एक सूत्र में पिरो रखा है।
ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत और अमेरिकी नजरिया
ग्रीनलैंड, जो भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिका का हिस्सा है लेकिन राजनीतिक रूप से डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है, दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है। अमेरिका की नजरें इस पर दशकों से रही हैं। 1946 में राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने इसे खरीदने के लिए 100 मिलियन डॉलर की पेशकश की थी। आधुनिक समय में, जलवायु परिवर्तन के कारण पिघलती बर्फ ने यहाँ छिपे विशाल खनिज संसाधनों (दुर्लभ मृदा तत्व, तेल और गैस) और नए समुद्री व्यापारिक मार्गों को उजागर कर दिया है।
अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड ‘आर्कटिक का द्वार’ है। चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका यहाँ अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाना चाहता है। लेकिन ‘खरीदने’ की इच्छा और ‘जबरन कब्जे’ के बीच जो महीन रेखा है, उसे पार करना अंतरराष्ट्रीय अराजकता को निमंत्रण देना है।
EU की चेतावनी: संप्रभुता बनाम सैन्य गठबंधन
यूरोपीय संघ का बयान उनकी संप्रभुता के प्रति असुरक्षा और स्वाभिमान को दर्शाता है। डेनमार्क यूरोपीय संघ का एक महत्वपूर्ण सदस्य है। यदि अमेरिका अपने ही एक सहयोगी देश (डेनमार्क) की क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन करता है, तो नाटो के ‘अनुच्छेद 5’ (Article 5) की प्रासंगिकता समाप्त हो जाएगी।
नाटो की पूरी संरचना इस विचार पर टिकी है कि “एक पर हमला, सब पर हमला माना जाएगा।” यदि हमलावर खुद गठबंधन का सबसे बड़ा सदस्य यानी अमेरिका ही हो, तो सुरक्षा की यह गारंटी एक मजाक बन जाएगी। यूरोपीय देशों के लिए यह संदेश होगा कि अमेरिका अब एक ‘रक्षक’ नहीं, बल्कि एक ‘विस्तारवादी शक्ति’ बन गया है। ऐसी स्थिति में जर्मनी, फ्रांस और अन्य यूरोपीय देश अपनी खुद की स्वतंत्र रक्षा प्रणाली बनाने के लिए मजबूर होंगे, जो नाटो के आधिकारिक अंत की घोषणा होगी।
रूस और चीन के लिए बढ़ता अवसर
अमेरिका और यूरोप के बीच की यह दरार मॉस्को और बीजिंग के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगी। नाटो का बिखरना रूस के लिए पूर्वी यूरोप में अपनी खोई हुई शक्ति को वापस पाने का रास्ता साफ कर देगा। वहीं, चीन जिसे अमेरिका ‘आर्कटिक राष्ट्र’ बनने से रोकना चाहता है, इस फूट का फायदा उठाकर यूरोपीय देशों के साथ नए आर्थिक और सुरक्षा समझौते कर सकता है। अमेरिका का एक गलत कदम उसे वैश्विक स्तर पर अलग-थलग कर देगा।
आर्थिक और कानूनी परिणाम
जबरन कब्जे का मतलब होगा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर की धज्जियां उड़ना। इससे वैश्विक व्यापार में अस्थिरता आएगी। यूरोपीय देश अमेरिका पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा सकते हैं, जिससे डॉलर की साख गिर सकती है। यह केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं होगा, बल्कि एक वैश्विक आर्थिक महामंदी की शुरुआत भी हो सकती है।
कूटनीति ही एकमात्र विकल्प
ग्रीनलैंड के लोग (इनुइट समुदाय) अपनी स्वतंत्रता और संस्कृति के प्रति बेहद जागरूक हैं। वे न तो डेनमार्क के पूर्ण नियंत्रण में रहना चाहते हैं और न ही अमेरिका का ‘मोहरा’ बनना चाहते हैं। अमेरिका को समझना होगा कि 21वीं सदी में इलाके ‘जीते’ नहीं जाते, बल्कि ‘सहयोग’ से प्रभाव बनाया जाता है।
EU की चेतावनी अमेरिका के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। यदि अमेरिका अपने सहयोगियों का विश्वास खो देता है, तो वह दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति होने के बावजूद अकेला पड़ जाएगा। नाटो की मजबूती अमेरिका की मजबूती है, और इस गठबंधन को ग्रीनलैंड जैसी क्षेत्रीय लालसा की वेदी पर चढ़ाना एक ऐतिहासिक भूल साबित होगी। लोकतंत्र के रक्षक होने का दावा करने वाले देशों को पहले अपने सहयोगियों के लोकतंत्र और सीमाओं का सम्मान करना होगा।