अजय तिवारी, BDC News
भारतीय राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह अक्सर अपने बयानों से चर्चा में रहते हैं, लेकिन हाल ही में कांग्रेस कार्य समिति (CWC) की बैठक से पहले उनके एक सोशल मीडिया पोस्ट ने पार्टी के भीतर और बाहर एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। आरएसएस और बीजेपी के संगठन कौशल की सराहना करने वाले उनके ट्वीट ने न केवल कांग्रेस आलाकमान को असहज किया, बल्कि पार्टी के भीतर वैचारिक स्पष्टता पर भी सवाल खड़े कर दिए।
एक पोस्ट और कई निशाने
दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक पुरानी तस्वीर साझा की, जिसमें वे लालकृष्ण आडवाणी के चरणों के पास फर्श पर बैठे नजर आ रहे हैं। इस तस्वीर के साथ सिंह ने संगठन की शक्ति का लोहा मानते हुए लिखा कि कैसे एक जमीनी स्वयंसेवक प्रधानमंत्री के पद तक पहुँच गया। एक ऐसे नेता से इस तरह की टिप्पणी आना, जो मोदी-आरएसएस के कट्टर आलोचक माने जाते हैं, राजनीतिक गलियारों में खलबली मचाने के लिए काफी था। हालाँकि, सिंह ने बाद में सफाई देते हुए खुद को ‘घोर विरोधी’ बताया, लेकिन राजनीतिक समीक्षक इसे कांग्रेस के भीतर विकेंद्रीकरण (Decentralization) और संगठन की कमजोरी की ओर एक कड़ा इशारा मान रहे हैं।
मजाकिया अंदाज या गंभीर चेतावनी?
स्थापना दिवस के मौके पर जब राहुल गांधी ने दिग्विजय सिंह से कहा, “आप अपना काम कर गए… आप बदमाशी कर गए,” तो यह महज एक मजाक नहीं था। राजनीति में शब्दों का चयन बहुत महत्वपूर्ण होता है। राहुल गांधी का यह बयान इस बात का संकेत है कि पार्टी नेतृत्व इस तरह के ‘असहज’ बयानों से प्रसन्न नहीं है, जो बीजेपी को मनोवैज्ञानिक लाभ पहुँचाते हों।
रेवंत रेड्डी और क्षेत्रीय नेतृत्व का पलटवार
इस विवाद में तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की एंट्री ने मामले को और दिलचस्प बना दिया। रेड्डी का सोनिया गांधी के फैसलों (नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की नियुक्ति) की तारीफ करना, दरअसल दिग्विजय सिंह के ‘संगठन शक्ति’ वाले तर्क का जवाब था। यह दिखाता है कि कांग्रेस का नया और उभरता हुआ क्षेत्रीय नेतृत्व अब पुरानी पीढ़ी के नेताओं द्वारा पैदा की गई ‘असहज स्थितियों’ को चुपचाप स्वीकार करने के मूड में नहीं है।
क्यों असहज है कांग्रेस?
पोस्ट से कांग्रेस नेताओं के बीच आपसी मन:द्वंद सामने आया है। कांग्रेस एक तरफ आरएसएस की विचारधारा को अपनी हार का कारण बताती है, वहीं उसके वरिष्ठ नेता उसी संगठन के ढांचे की प्रशंसा करते हैं। यह पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम पैदा करता है। CWC की बैठक में मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा दिग्विजय सिंह को टोकना यह दर्शाता है कि पार्टी अब संदेशों (Narrative) पर नियंत्रण चाहती है। दिग्विजय सिंह का बार-बार ‘विकेंद्रीकरण’ की बात करना यह संकेत देता है कि पार्टी के पुराने दिग्गजों का एक वर्ग मौजूदा संगठनात्मक ढांचे में बदलाव की आवश्यकता महसूस कर रहा है। दिग्विजय सिंह का यह कदम भले ही संगठन को मजबूत करने की एक ‘सलाह’ के रूप में देखा जाए, लेकिन इसकी टाइमिंग और संदर्भ ने कांग्रेस के लिए ‘सेल्फ-गोल’ जैसी स्थिति पैदा कर दी है। क्या कांग्रेस इस आंतरिक वैचारिक मंथन से उभर पाएगी या यह विवाद आने वाले चुनावों में विपक्ष को एक और हथियार दे देगा, यह देखने वाली बात होगी।