अजय तिवारी
भारत और बांग्लादेश के संबंध, जो कभी ‘सुनहरे अध्याय’ के रूप में देखे जाते थे, वर्ष 2025 के अंत तक अपने सबसे कठिन और अनिश्चित दौर से गुजर रहे हैं। अगस्त 2024 में शेख हसीना के पतन के बाद से शुरू हुआ यह राजनीतिक बदलाव अब एक गहरे राजनयिक संकट में तब्दील हो चुका है।
अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना का भारत आना रिश्तों में तनाव का सबसे बड़ा कारण बना। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार और भारत के बीच विश्वास की एक बड़ी खाई पैदा हो गई है। जहाँ बांग्लादेश की वर्तमान सरकार शेख हसीना काे मांग रही है। वहीं, भारत ने उन्हें मानवीय आधार पर शरण दी है। दिसंबर 2025 में बांग्लादेशी न्यायाधिकरण द्वारा हसीना को दी गई मृत्युदंड की सजा ने इस मामले को और अधिक जटिल बना दिया है।
हाल के महीनों में बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा ने भारत में भारी जनाक्रोश पैदा किया है। दिसंबर 2025 में मयमनसिंह में दीपू चंद्र दास नामक हिंदू युवक की मॉब लिंचिंग और इस्कॉन संत चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी ने आग में घी डालने का काम किया है। इन घटनाओं के विरोध में दिल्ली और कोलकाता स्थित बांग्लादेशी दूतावासों के बाहर बड़े प्रदर्शन हुए हैं, जिससे दोनों देशों के बीच राजनयिक तल्खी बढ़ गई है।
तनाव का असर अब आम नागरिकों पर भी पड़ रहा है। सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए बांग्लादेश ने दिल्ली, त्रिपुरा और सिलीगुड़ी में अपनी वीजा सेवाओं को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित कर दिया है। जवाब में, भारत ने भी अपने वीजा केंद्रों को केवल मेडिकल और आपातकालीन श्रेणियों तक सीमित कर दिया है। दोनों देशों द्वारा एक-दूसरे के राजदूतों को बार-बार तलब करना यह दर्शाता है कि संवाद के रास्ते संकरे हो रहे हैं।
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा है। शेख हसीना के दौर में चरमपंथी समूहों पर जो लगाम कसी गई थी, अब उसके ढीले होने का डर है। साथ ही, बांग्लादेश में चीन और पाकिस्तान की बढ़ती सक्रियता (जैसे लालमोनिरहाट एयरबेस का विकास) भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रही है। ‘चिकन नेक’ (सिलिगुड़ी कॉरिडोर) की सुरक्षा को लेकर भी सामरिक गलियारों में चिंताएं बढ़ी हैं। फरवरी 2026 में बांग्लादेश में होने वाले संभावित आम चुनावों से पहले वहां की आंतरिक राजनीति में ‘भारत-विरोधी’ विमर्श तेज हो गया है।