अजय तिवारी, संपादक
इंदौर, जिसे हम ‘देश का सबसे स्वच्छ शहर’ कहते नहीं थकते, आज अपनी उसी स्वच्छता के दावों के मलबे के नीचे दबा खड़ा है। भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई 18 मौतों ने यह साबित कर दिया है कि स्वच्छता का तमगा केवल सड़कों की चकाचौंध तक सीमित है, जबकि शहर की रगों (पाइपलाइनों) में भ्रष्टाचार और लापरवाही का जहर बह रहा है। हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी- “दुनियाभर में इंदौर की छवि खराब हुई है”—दरअसल उस प्रशासनिक खोखलेपन की ओर इशारा है, जहाँ अधिकारी फाइलों को दबाए बैठे रहे और लोग दम तोड़ते रहे।
कोर्ट में सुनवाई के दौरान जो तथ्य सामने आए, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। 2017-18 में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के 60 में से 59 सैंपल फेल हुए, लेकिन नगर निगम कुंभकर्णी नींद सोता रहा। भागीरथपुरा की पाइपलाइन बदलने का प्रस्ताव नवंबर 2022 से फाइलों में धूल फांकता रहा। क्या यह ‘क्रिमिनल नेग्लिजेंस’ (आपराधिक लापरवाही) नहीं है? जब एक मजदूर की मौत पर ठेकेदार पर केस दर्ज हो सकता है, तो 18 लोगों की जान लेने वाले इन ‘कुर्सीधारी’ अधिकारियों पर एफआईआर क्यों नहीं?
माननीय न्यायालय ने सही कहा कि “साफ पानी नागरिकों का मौलिक अधिकार है।” लेकिन इंदौर में इस अधिकार का गला घोंटा गया है। सरकार मौतों के आंकड़ों को ‘कार्डियक अरेस्ट’ बताकर छिपाने की कोशिश कर रही है, जो शर्मनाक है। जब पार्षद खुद टंकियों से गाद निकालते वीडियो में दिख रहे हों, तो यह स्पष्ट है कि अमृत योजना के करोड़ों रुपये कहाँ ‘अमृत’ बनकर अधिकारियों की जेबों में समा गए।
अब जवाबदेही की बारी कोर्ट का मुख्य सचिव को 15 जनवरी को तलब करना यह बताता है कि न्यायपालिका अब ‘निलंबन’ के ड्रामे से संतुष्ट होने वाली नहीं है। यह मुद्दा अब केवल भागीरथपुरा का नहीं, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश की लचर जल आपूर्ति व्यवस्था का है। क्या सरकार यह बताएगी कि क्यों जनता ‘टैक्स’ शुद्ध जल के लिए देती है और उसे बदले में ‘जहर’ मिलता है?
इंदौर की छवि केवल धूल झाड़ने से नहीं सुधरेगी, बल्कि उन चेहरों को बेनकाब करने से सुधरेगी जिन्होंने फाइलों को रोककर मौत के वारंट पर दस्तखत किए। हाई कोर्ट की टिप्पणी एक चेतावनी है-अगर अब भी जवाबदेही तय नहीं हुई, तो ‘स्वच्छता का गौरव’ केवल इतिहास की किताबों का हिस्सा बनकर रह जाएगा।
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