गणतंत्र का महापर्व: अधिकारों की हुंकार और कर्तव्यों की पुकार

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अजय तिवारी, संपादक
26 जनवरी का दिन केवल एक कैलेंडर की तारीख या राष्ट्रीय अवकाश मात्र नहीं होता, बल्कि यह भारतीय लोकतन्त्र की आत्मा के पुनरावलोकन का क्षण होता है। 1950 में आज ही के दिन हमने दुनिया के सबसे व्यापक और प्रगतिशील संविधान को अंगीकार किया था। संविधान ने हमें ‘प्रजा’ से ‘नागरिक’ बनाया और हमें गरिमा के साथ जीने के वे अधिकार दिए, जिनका सपना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने वर्षों के दमन के बीच देखा था। लेकिन, आजादी के सात दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद आज यह विचार करना अनिवार्य है कि क्या हम केवल ‘अधिकार-जीवी’ समाज बनकर रह गए हैं? क्या गणतंत्र की सार्थकता केवल माँगों में है, या उन कर्तव्यों के निर्वहन में भी, जो राष्ट्र की नींव को मजबूती देते हैं?

अधिकारों की ढाल: संविधान का गौरव

भारतीय संविधान का भाग-3 हमें ‘मौलिक अधिकार’ प्रदान करता है। ये अधिकार वे सुरक्षा कवच हैं जो राज्य की निरंकुशता के विरुद्ध सामान्य नागरिक को खड़े होने की शक्ति देते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता का अधिकार और जीवन की सुरक्षा—इन स्तंभों ने भारत को एक जीवंत लोकतंत्र बनाए रखा है। एक ऐसा देश जहाँ विविधता के इतने रंग हैं, वहाँ अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या ने ही देश को एक सूत्र में पिरोया है। अधिकारों की इसी चेतना का परिणाम है कि आज समाज का सबसे वंचित तबका भी अपने हक के लिए आवाज उठाना जानता है। यह हमारी लोकतांत्रिक परिपक्वता का प्रमाण है। लेकिन जब हम अधिकारों की बात करते हैं, तो अक्सर यह भूल जाते हैं कि अधिकार शून्यता में नहीं पनपते; वे एक सामाजिक अनुबंध का हिस्सा हैं।

कर्तव्यों की विस्मृति: एक बढ़ती खाई

बीते कुछ दशकों में भारतीय नागरिकता का स्वरूप ‘लेने’ (Claiming) पर अधिक और ‘देने’ (Contributing) पर कम केंद्रित हो गया है। संविधान निर्माताओं ने हालांकि मूल रूप से कर्तव्यों का उल्लेख नहीं किया था (जिन्हें बाद में 1976 में 42वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 51A के तहत जोड़ा गया), लेकिन उनकी अपेक्षा थी कि अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू होंगे।

गांधीजी ने कहा था— “अधिकारों का असली स्रोत कर्तव्य होता है। यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, तो अधिकार हमसे दूर नहीं रह सकते।” आज स्थिति यह है कि हम बेहतर सड़कों का अधिकार तो मांगते हैं, लेकिन सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा का कर्तव्य भूल जाते हैं। हम स्वच्छ पर्यावरण का हक जताते हैं, लेकिन कचरा प्रबंधन के प्रति अपनी जिम्मेदारी से मुँह मोड़ लेते हैं। हम कानून के शासन की बात करते हैं, लेकिन यातायात के छोटे-छोटे नियमों को तोड़ना अपनी शान समझते हैं। यह ‘अधिकार-कर्तव्य का असंतुलन’ ही है जो सामाजिक अव्यवस्था का कारण बनता है।

राष्ट्र निर्माण में नागरिक जिम्मेदारी

26 जनवरी का दिन आत्म-मंथन का अवसर है। एक विकसित राष्ट्र का सपना केवल सरकारी नीतियों या बजट के आवंटन से पूरा नहीं होता, वह नागरिकों के आचरण से फलीभूत होता है। 1.53 लाख किलो स्टील निकालकर बीआरटीएस हटाना या नए पुल बनाना प्रशासन का काम है, लेकिन उन संसाधनों का सम्मान करना नागरिक का धर्म है।

कर्तव्यों की सूची केवल संविधान की किताब तक सीमित नहीं होनी चाहिए। राष्ट्र के प्रति प्रेम का अर्थ केवल सीमा पर खड़े सैनिक का सम्मान करना नहीं है, बल्कि पानी, बिजली और सार्वजनिक धन की बर्बादी रोकना, अंधविश्वास और अफवाहों से दूर रहकर समाज में तर्कसंगत सोच को बढ़ावा देना, विविधता का सम्मान करना और सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखना। चुनावों में केवल वोट देना ही काफी नहीं, बल्कि स्थानीय प्रशासन और सामाजिक सुधारों में सक्रिय भूमिका निभाना।

बदलता भारत और नई चुनौतियां

आज जब भारत विश्व पटल पर ‘विश्वगुरु’ बनने की ओर अग्रसर है, तब हमारी चुनौतियां भी वैश्विक हैं। जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा और आर्थिक विषमता जैसी समस्याओं का समाधान केवल कानून बनाकर नहीं किया जा सकता। इसके लिए एक ‘सजग नागरिक समाज’ की आवश्यकता है। अधिकारों की लड़ाई लड़ना वीरता है, लेकिन कर्तव्यों के प्रति सजग रहना देशभक्ति है।
अक्सर देखा जाता है कि लोग राजनीतिक दलों और नेताओं से जवाबदेही मांगते हैं, जो कि उचित है। लेकिन क्या हम स्वयं से यह सवाल पूछते हैं कि हमने अपने पड़ोस, अपने शहर या अपने देश के लिए व्यक्तिगत स्तर पर क्या योगदान दिया? क्या हम कर चोरी (Tax evasion) करते हुए भ्रष्टाचार मुक्त भारत की मांग कर सकते हैं? क्या हम सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाते हुए ‘स्वच्छ भारत’ का सपना देख सकते हैं?

संतुलन ही समाधान है

26 जनवरी का यह महापर्व हमें याद दिलाता है कि संविधान एक निर्जीव दस्तावेज नहीं, बल्कि एक जीवित मार्गदर्शिका है। अधिकार हमें ‘मनुष्य’ बनाते हैं, तो कर्तव्य हमें ‘श्रेष्ठ नागरिक’। जिस दिन भारत का हर नागरिक अपने अधिकारों को अपने कर्तव्यों की कसौटी पर तौलने लगेगा, उस दिन देश की आधी समस्याएं स्वतः समाप्त हो जाएंगी।

गणतंत्र की असली मजबूती संसद की दीवारों में नहीं, बल्कि उन गलियों और मोहल्लों में है जहाँ नागरिक एक-दूसरे के प्रति सम्मान और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का भाव रखते हैं। आइए, इस गणतंत्र दिवस पर हम केवल तिरंगा न फहराएं, बल्कि अपने भीतर उन नागरिक कर्तव्यों की ज्योत भी जलाएं जो हमें वास्तव में एक स्वतंत्र और सशक्त गणराज्य बनाते हैं। अधिकारों की मांग करना हमारा संवैधानिक बल है, लेकिन कर्तव्यों का पालन करना हमारा नैतिक ऋण है। इस ऋण को चुकाने का संकल्प ही 26 जनवरी की सच्ची सार्थकता होगी।

जय हिंद, जय भारत!

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