नई दिल्ली| BDC news|bhopalonline.org
सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में अधिसूचित ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026′ पर अंतरिम रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या की पीठ ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट का मानना है कि वर्तमान नियमों का ड्राफ्ट अस्पष्ट है और इसका दुरुपयोग होने की प्रबल संभावना है।
1. विवाद की जड़: नए नियमों में क्या है?
UGC ने 13 जनवरी, 2026 को नए नियम लागू किए थे, जिनका उद्देश्य परिसरों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकना था। इसके मुख्य बिंदु थे-
- समितियों का गठन: कॉलेजों में ‘इक्वल अपॉर्च्यूनिटी सेंटर’ (EOC) और ‘इक्विटी स्क्वाड’ बनाने का निर्देश।
- शिकायत निवारण: भेदभाव की शिकायत पर 24 घंटे में कार्रवाई और 15 दिन में रिपोर्ट अनिवार्य।
- सख्त कार्रवाई: नियमों का पालन न करने पर संस्थानों की मान्यता रद्द करने या ग्रांट रोकने का प्रावधान।
- OBC को शामिल करना: 2012 के नियमों के विपरीत, इसमें OBC छात्रों को भी सुरक्षा के दायरे में लाया गया।
2. सुप्रीम कोर्ट की मुख्य आपत्तियां और टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान अदालत ने नियमों की संवैधानिक वैधता पर गंभीर सवाल उठाए-
- परिभाषा का अभाव: कोर्ट ने पूछा कि क्या ये नियम ‘रैगिंग’ जैसे मुद्दों को कवर करते हैं? वकील विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि नियमों में रैगिंग की परिभाषा ही गायब है, जिससे छात्रों को बिना ठोस आधार के जेल जाना पड़ सकता है।
- रिवर्स भेदभाव की आशंका: CJI ने टिप्पणी की कि यदि आरक्षित वर्ग का कोई छात्र किसी अन्य छात्र के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग करता है, तो उसके लिए नियमों में कोई समाधान नहीं दिखता।
- अस्पष्टता: कोर्ट ने कहा कि “प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं” और यह शैक्षणिक माहौल में अराजकता पैदा कर सकते हैं।
3. सवर्ण और जनरल कैटेगरी के छात्रों का विरोध क्यों?
याचिकाकर्ताओं और प्रदर्शनकारी छात्रों का तर्क है कि ये नियम एकतरफा हैं:
- स्वाभाविक अपराधी का ठप्पा: आरोप है कि नियम 3(C) के तहत केवल जनरल कैटेगरी के छात्रों को ही आरोपी माना जा सकता है। सवर्ण छात्र भेदभाव के ‘शिकार’ (Victim) नहीं हो सकते।
- झूठी शिकायत पर सुरक्षा नहीं: पहले के ड्राफ्ट में झूठी शिकायत करने वाले पर दंड का प्रावधान था, जिसे फाइनल नोटिफिकेशन में हटा दिया गया। इससे द्वेषपूर्ण शिकायतों का खतरा बढ़ गया है।
- प्रतिनिधित्व की कमी: ‘इक्विटी कमेटी’ में जनरल कैटेगरी का कोई सदस्य शामिल नहीं है, जिससे निष्पक्ष जांच पर सवाल उठ रहे हैं।
4. नियमों का इतिहास: रोहित वेमुला से 2026 तक
- 2012: पहली बार इक्विटी नियम बने, लेकिन वे केवल दिशा-निर्देश थे।
- 2016-2019: रोहित वेमुला और पायल तडवी की आत्महत्या के बाद नियमों को सख्त बनाने की मांग उठी।
- 2025: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर UGC ने नया ड्राफ्ट तैयार किया।
- 2026: सरकार ने नियमों को अधिसूचित किया, जिसके बाद विवाद बढ़ा और अब कोर्ट ने रोक लगा दी।
5. अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह केवल ‘संवैधानिकता’ की जांच कर रही है। कोर्ट ने सुझाव दिया है कि एक ऐसी कमेटी बनाई जाए जिसमें सामाजिक मूल्यों के विशेषज्ञ हों जो नियमों का पुन: ड्राफ्ट तैयार कर सकें। अगली सुनवाई 19 मार्च, 2026 को तय की गई है, तब तक पुराने (2012 के) नियम ही प्रभावी रहेंगे।