मध्य प्रदेश के आठ शहरों में गहराता वायु प्रदूषण संकट
एनजीटी की कड़ी फटकार और समाधान की आवश्यकता।
अजय तिवारी, संपादक
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की भोपाल बेंच द्वारा मध्य प्रदेश के आठ प्रमुख शहरों में वायु प्रदूषण की भयावह स्थिति पर जताई गई चिंता केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि प्रदेश के सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बजती खतरे की घंटी है। मध्य प्रदेश, जो अपनी हरियाली और स्वच्छ वातावरण के लिए जाना जाता था, आज उसके आठ बड़े महानगर-भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, देवास, सागर और सिंगरौली-‘नॉन अटेनमेंट सिटी’ की सूची में शामिल हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि इन शहरों की हवा पिछले पांच वर्षों से सांस लेने योग्य मानकों को लगातार तोड़ रही है। विशेषकर भोपाल, जिसे ‘झीलों की नगरी’ कहा जाता है, वहां का एक्यूआई स्तर 300 के पार जाना और धुंध की चादर में लिपटी सुबहें यह दर्शाती हैं कि प्रकृति और विकास के बीच का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है
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एनजीटी का यह हस्तक्षेप उस कड़वे सच को उजागर करता है जिसे अक्सर विकास की चकाचौंध में दबा दिया जाता है। वायु प्रदूषण का यह संकट किसी एक कारण की उपज नहीं है, बल्कि यह पराली जलाने, अनियंत्रित निर्माण कार्यों से उड़ती धूल, वाहनों के बेलगाम उत्सर्जन और कचरा प्रबंधन की विफलता का सामूहिक परिणाम है। यह बेहद चिंताजनक है कि जब दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों में प्रदूषण से लड़ने के लिए ‘ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान’ जैसे कड़े कदम उठाए जा रहे हैं, तब मध्य प्रदेश शासन और संबंधित विभाग अब तक किसी ठोस कार्ययोजना को धरातल पर उतारने में विफल रहे हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की निष्क्रियता और एयर शेड आधारित नीति का अभाव इस समस्या को ‘गंभीर’ से ‘अति गंभीर’ श्रेणी में ले आया है।
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अधिकरण द्वारा गठित संयुक्त समिति और आठ सप्ताह के भीतर मांगी गई विस्तृत रिपोर्ट सरकार के लिए अपनी जवाबदेही तय करने का अंतिम अवसर है। अब समय केवल नोटिस जारी करने या समितियां बनाने का नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर सख्त कार्रवाई करने का है। निर्माण कार्यों के लिए कड़े नियमों का पालन, सार्वजनिक परिवहन में सुधार, कचरा जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध और औद्योगिक उत्सर्जन की रियल-टाइम निगरानी जैसे कदम अब अनिवार्य हो गए हैं। यदि अब भी प्रशासन और समाज नहीं चेता, तो आने वाली पीढ़ियों के पास विरासत में देने के लिए केवल प्रदूषित हवा और बीमार फेफड़े ही बचेंगे। 18 मार्च की अगली सुनवाई से पहले सरकार को यह सिद्ध करना होगा कि वह अपने नागरिकों के ‘सांस लेने के अधिकार’ की रक्षा के प्रति गंभीर है।